Thursday, November 18, 2010

धर्मः मानव जीवन की विडंबना

 ‍आधुनिक युग की वैज्ञानिक प्रगति स्तब्ध कर देने वाली है। इस प्रगति के पहिए की गति रोज़-ब-रोज़ तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है। कैसी अजीब विडंबना है कि मनुष्य के चारों ओर रोशनी ही रोशनी है मगर उसके अंतर में घोर अंधेरा है। मनुष्य के चारों ओर भीड़ ही भीड़ है मगर उसके अंतर में वीरानी और सुनापन है। बाहर सुख-सामग्री के अंबार है, सुविधाओं के ढेर हैं, मगर अंतर में दरिद्रता है, आख़िर क्यों ?
जीवन की यह दारुण त्रासदी है। आज मनुष्य पर धन-दौलत का भूत इस तरह सवार हो गया है कि उसकी समूची चिंतन प्रक्रिया प्रदूषित और नकारात्मक हो गई है। धन-दौलत की प्रबल चाहत में न केवल नैतिक मूल्य गौण हो गए हैं, बल्कि मानव जीवन में मूल्यों का शून्यक उपस्थित हो गया है। भौतिकता के इस दौर में न संबंधों का कोई महत्व रह गया है और न रिश्ते-नातों का। आज मनुष्य की नाप-तोल उसके पेशे और कमाई से की जा रही है। जिसके पास पैसा है, आज वही विद्वान है, वही सम्मानीय है, समाज में उसी का रूतबा है, चाहे वह लूटेरा व कातिल ही क्यों न हो।

अगर हम बाजार से एक माटी का दीया खरीदते हैं तो उसे हर रूख से देखकर खरीदते हैं। मगर जिन्‍दगी के मामले में इतने बेख़बर और लापरवाह है कि इसका कोई मूल्य नहीं समझते। हमारी ज़िंदगी का पल दर पल और कदम दर कदम हमें मौत की तरफ ले जा रहा है मगर हम इतनी बेफ़िक्री से जिन्‍दगी गुज़ार रहे हैं गोया कि हमें इस दुनिया से कभी जाना ही नहीं है।

अक्सर देखा जाता है कि आदमी की रात-दिन की भागदौड़ केवल पैसे और पेट के लिए है। लोगों की बातचीत का मौजू खाने-कमाने और मौजमस्ती के सिवाय कुछ और दिखाई नहीं पड़ता। जीवन के प्रति गंभीर चिंतन और सोच-विचार से अक्सर लोग खाली नज़र आते हैं। अधिकतर लोग ऐसे हैं जिनके ज़हन में इस विषय का सिरे से कोई तसव्वुर ही नहीं होता कि मानव जीवन का कोई उच्च लक्ष्य भी होता है या होना चाहिए। दुनियावीं मामलों में तो लोग काफ़ी समझदार और तेज़तर्रार देखे जाते हैं मगर जीवन के अभीष्ट (Aim) के विषय में उनके पास घिसी-पिटी और सड़ी-गली परंपरावादिता के सिवाय कुछ और नहीं होता।
अजीब विडंबना है कि लोग मालामाल तो होना चाहते हैं मगर काबिल और नेक बनना नहीं चाहते। दौलत कमाने के रास्ते में साधन की पवित्रता उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखती। आज के दौर में नेकी और ईमानदारी की बात करना ठीक ऐसा है जैसा कि हम लोगों की फ़ितरत के ख़िलाफ़ बात कर रहे हों। विचित्र विडंबना है कि आदमी को सुख और सुकून की तो तलाश है मगर ऐसी जगह ढूंढ रहा है जहाँ केवल बेकारी व बेकली के सिवाय कुछ नहीं। भला कुकृत्यों और लूट-खसोट की परिणति कभी सुखदायी कैसे हो सकती है ? भला बबूल का बीज बोकर आम और अंगूर की ख़्वाहिश कैसे पूरी हो सकती है ?

इसे भी मानव जीवन की विडंबना ही कहेंगे कि आदमी को दूसरों की बुराइयां और कमज़ोरियां तो खूब नज़र आती हैं, मगर अपनी बुराइयां और खामियां उसे नज़र नहीं आती। आदमी दूसरों का आकलन तो खूब करना जानता है, मगर फुर्सत में कभी अपना आकलन नहीं करता। अक्सर देखने में आता है कि आदमी जिस फीते से अपने आपको नापता है, दूसरों को नापने के लिए उस फीते का इस्तेमाल नहीं करता। यह भी देखने में आता है कि आदमी खुद अच्छी औलाद साबित नहीं होता, अपनी औलाद के सामने ही अपने बूढ़े माँ-बाप की नाकद्री करता है, मगर अपनी औलाद से यह उम्मीद करता है कि उसकी औलाद बुढ़ापे में उसके साथ अच्छा सुलूक करें। यह भी एक तथ्य है कि आदमी खुद भ्रष्ट होता है, मगर दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है। आदमी की कथनी और करनी में ज़मीन आसमान का अंतर देखने में आता है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहें ?
यह भी मानव जीवन की विडंबना ही है कि मनुष्य उस परम सत्ता के लिए तर्क और सबूत चाहता है जिसके अस्तित्व की निशानियां और प्रमाण कदम-कदम और ज़र्रे-ज़र्रे में मौजूद हैं और आदमी अपनी खुली आंखों से देख भी रहा है। भला बिना किसी नियंता के इस असीम और अद्भुत ब्रह्मांड का नियमन कैसे हो सकता है ? इस अति विशाल सृष्टि की नियमबद्धता और एक सूत्रता क्या इस तथ्य का खुला सबूत नहीं है कि कोई अदृश्य शक्ति इसका संचालन कर रही है ? कुछ लोग दुनियावीं ऐतबार से इतने काबिल हुए हैं कि उन्होंने अपने विचारों और कार्यों से दुनिया के एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया मगर उनकी अक्ल ने कभी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया। इन लोगों की लम्बी सूची में कार्ल माक्र्स (1818-1883), फ्रीडरिक नीत्शे (1844-1900), सिगमंड फ्रायड (1859-1939), बट्र्रंड रसल (1872-1956), अलबर्ट आइंसटीन (1879-1965), डा. भीमराव अंबेडकर (1891-1956), पंडित जवाहर लाल नेहरु (1889-1964), मानवेन्द्र नाथ राय (1886-1954) आदि कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने एक ऐसे सत्य का इंकार किया, जिसका इंकार इतनी बड़ी बेवकूफ़ी है जैसे कि कोई आदमी मृत्यु का इंकार करें और कहे कि उसे कभी मरना ही नहीं है। मृत्यु का सीधा सा मतलब ही यह है कि हमारा जीवन किसी अदृश्य सत्ता के अधीन है। आदमी मृत्यु का इंकार नहीं करता, मगर विडंबना है कि परम सत्ता का इंकार कर देता है। 

यहां उक्त विषयों के साथ यह बात भी ग़ौर करने के काबिल है कि अगर आदमी की ज़िंदगी का उद्देश्य कमाना-खाना और मौजमस्ती के सिवाय कुछ और नहीं है, तो फिर जंगली जानवरों की जिंदगी आदमी की ज़िंदगी से कहीं अधिक बेहतर है और अगर कमाने-खाने और मौजमस्ती के सिवाय भी आदमी की ज़िंदगी का कोई और उच्च उद्देश्य है तो फिर उसे छोड़कर या भूलकर आदमी की जिंदगी जंगली जानवरों की ज़िंदगी से कहीं अधिक बदतर है।

 कुछ लोग और समाज ऐसे हैं जो उस एक परम और चरम अदृश्य चेतन शक्ति को छोड़कर सूरज, चांद, तारे, मज़ार, नदी, वृक्ष, व्यक्ति, पशु आदि की पूजा-उपासना करते हैं। कैसी विचित्र विडंबना है कि लोग अपने हाथों से बनाई मूर्तियों को अपना इष्ट समझते हैं। पूजा-अर्चना के नाम पर मंदिरों में गाना-बजाना, नाचना होता है। हिंदू समाज में इतने देवी-देवता और पूजा पद्धतियाँ हैं कि शायद ही कोई समझ सके। असंख्य देवी देवताओं के बावजूद उपास्यों की संख्या रोज़-ब-रोज़ बढ़ती जा रही है। प्रतिवर्ष देवी-देवताओं के लुक और डिज़ाइन बदल जाते हैं। हमारे देवी देवता भी वक्त के साथ आधुनिक (Modern) और साइंटिफिक होते जा रहे हैं। एक ईश्वर की पूजा अर्चना करके मनुष्य संतुष्ट ही नहीं है। संतुष्ट हो भी तो कैसे, जब उसे यह पता ही नहीं है कि वह क्या और क्यों कर रहा है ?
प्रत्येक व्यक्ति और समाज जिसकी धारणा और आराधना विशुद्ध रूप से एक ईश्वर के लिए न हो, वह अज्ञानी और अज्ञान पूर्ण समाज है। यह एक विशुद्ध सत्य है, इसमें संदेह की कतई कोई गुंजाइश नहीं है। विडंबना यह है कि मनुष्य उस एक परम शक्ति को समझने और मानने के लिए तैयार नहीं है। बस आंखे बंद कर उसे ही सत्य मान लेता है जिसे वो परंपरा में देखता आ रहा है। सत्य को झुठलाकर और मूल से मुंह मोड़कर भला मनुष्य कैसे संतुष्ट हो सकता है ? भला अपने हाथों बनाई भिन्न प्रकार की मूर्तियों के आगे गाना, बजाना, नाचना और फूल, फल, पत्ते आदि चढ़ाना धर्म और आराधना का हिस्सा कैसे हो सकता है ? यह सब ढोंग है। आख़िर यह बात हमारी समझ में क्यों नहीं आती ?

हिंदू समुदाय में विभिन्न प्रकार के व्रत-उपवासों का प्रचलन है। उपवास का अर्थ तो यह है कि जिस दिन का उपवास हो, उस दिन कुछ भी न खाया-पिया जाए, पानी भी नहीं। दिन की अवधि भोर होने से सूर्य अस्त होने तक है। मगर यह विडंबना है कि विभिन्न प्रकार के हिंदू धर्म अनुयायी उपवास की अवधि में कुछ पदार्थों को छोड़कर सब कुछ खाते-पीते हैं। उपवास के दिन पानी, चाय, दूध तो क्या, कोट्टू और सिंघाड़े के आटे के पराठे-पकौड़ी, आलू के बने आइटम, टिकिया, हलुवा, चिप्स आदि, पौसाई के चावल और साबूदाने की खीर आदि, फलाहार केला, सेब, संतरा, अनार, अमरूद, पपीता आदि, सलाद, खीरा, ककड़ी आदि, चैलाई के लड्डू, मिठाइयां आदि, काजू, मखाने, मूंगफली, अखरोट आदि सब कुछ खाया-पिया जाता है। उक्त आइटमों के साथ बीड़ी-सिगरेट, पान आदि की भी कोई मनाही नहीं है। ये सब आइटम सूर्य उदय होने के बाद और अस्त होने से पहले उसी अवधि में खाये-पिये जाते हैं, जिस अवधि का उपवास होता है। बस गेहूँ, चना, चावल, हल्दी और साधारण नमक आदि नहीं खाया जाता। साधारण नमक की जगह सेंधा नमक इस्तेमाल किया जाता है। अब ज़रा सोचिए! अगर उपवास के दिन सब कुछ खाया-पिया जा सकता है तो फिर उपवास कैसा? आख़िर उक्त विधि-निषेधों का मूल स्रोत क्या है ? कहा जाता है कि उपवास के दिन अन्न नहीं खाया जाता और अन्न केवल गेहूं, चना, चावल, दाल, मक्का, हल्दी आदि भोज्य पदार्थ हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि अन्न प्रत्येक भोज्य पदार्थ को कहते हैं। आख़िर इतनी सी बात हमारी समझ में क्यों नही आती कि उपवास का मतलब कुछ भी न खाने से है ? मगर हम चंद चीजों को छोड़कर सब कुछ खाते-पीते हैं। आख़िर ऐसे उपवास की हमारे जीवन में महत्व और उपयोगिता क्या है ? आख़िर हम सोचते क्यों नहीं ? कहीं अंधविश्वासों से हमारी चिंतन शक्ति जवाब तो नहीं दे गई है ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम एक समुदाय विशेष के विरोध और द्वेष में ऐसा कर रहे हों कि वे अपने उपवास में कुछ नहीं खाते, हम सब कुछ खाएंगे। क्या धर्म के नाम पर हम अपनी मर्जी से कुछ भी करें हमारे लिए वही सत्य है ? क्या हमारी आस्थाओं और धारणाओं का कोई आधार नहीं है, जो हमारा मार्गदर्शन करें ?
हिंदू समाज में अनेक ऐसे रीति रिवाज और कर्मकांड प्रचलित हैं जो न तो धर्म का हिस्सा है और न ही सामाजिक दृष्टि से उनकी कोई उपयोगिता है। वे रीति-रिवाज केवल आडंबर और ढोंग हैं, मगर लोगों ने उन कर्मकांडों को धार्मिक रीति-रिवाज से जोड़ दिया है। धार्मिक त्योहारों के नाम पर ऐसी-ऐसी परंपराओं का निर्वाह किया जा रहा है कि जो न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि मानवता को शर्मसार करने वाली है। विडंबना यह है कि उन परंपराओं को निभाने में पूरा समाज पूरी निष्ठा और धार्मिकता के साथ संलिप्त और निमग्न है। वास्तविक धार्मिक प्रतिमानों और संदेशों से अनभिज्ञ लोग धर्म के नाम पर संस्कारहीन और अनैतिक आचरण करते हैं। धार्मिक त्योहारों में पूजा-अर्चना के नाम पर अनैतिक और अमर्यादित मौजमस्ती, नाचना, गाना-बजाना होता है। धर्म और अध्यात्म के नाम पर होली का हुड़दंग, अश्लीलता और मोज़मस्ती होती है। होली के दिन जहां शराब पी जाती है, वहीं दीपावली के दिन जुआ खेला जाता है। एक तरफ यज्ञ को पूजा और पर्यावरण शुद्धि का अनुष्ठान समझा जाता है, वहीं दीपावली के दिन वायु को विषाक्त और प्रदूषित करने को धर्म का हिस्सा समझा जाता है। आंकड़े बताते हैं कि लगभग 2500 से 3000 करोड़ रुपये का गंधक और पोटाश प्रतिवर्ष दीपावली के दिन वातावरण में घोल दिया जाता है। 

कैसी विडंबना है कि जहाँ जैन समाज के लोग तीर्थंकर महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस को प्रतिवर्ष दीपावली के रूप में मनाते हैं, वहीं आर्यसमाजी स्वामी दयानंद सरस्वती के मृत्यु दिवस को उत्साह और खुशी के साथ मनाते हैं। विदित रहे कि दोनों महापुरुषों की मृत्यु दीपावली के दिन हुई थी। समाज में एक बात यह भी देखने में आ रही है कि शादी समारोह हो या बूढ़े व्यक्ति का मृतक भोज, दोनों में कोई अंतर देखने में नहीं आता। विचारणीय अवसरों पर भी लोगों की बातचीत का मौजू खाना-कमाना ही होता है।
एक नज़र भारतीय साधु समाज को देखिए, जो परिवार और समाज के दायित्व से बहुत दूर निठल्ली और ऐश परस्त ज़िंदगी जी रहा है। उनके अंदर अंधविश्वास, ढोंग और छल कपट कूट-कूट कर भरा होता है। भिन्न प्रकार के साधु जिनकी तादाद लगभग 70 लाख बताई जाती है, उन साधु महात्माओं में अधिकतर लोग अपराधी और अपराध प्रवृत्ति के होते हैं। उनके कृत्यों को देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। उनके अंदर धर्म और नैतिकता का कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ता। नंगे और गंदे रहने को वे तप और तपस्या समझते हैं। शराब, सुलफा, भांग, गांजा पीने-खाने को वे धर्म और पुण्य का काम समझते हैं। यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि हिंदू-मंदिरों में स्त्रियों के सामने साधुओं का सुलफा, शराब पीकर नग्न तांडव करना और उत्पात मचाना साधारण सी बात है। मंदिरों की दशा दयनीय ही नहीं बल्कि चिंताजनक है। ग्रामीण क्षेत्रों में मंदिर सामूहिक नशा केन्द्र तो हैं ही, वहाँ महात्माओं द्वारा सट्टेबाजों को सट्टे भी बताए जाते हैं। हिंदू मंदिरों में धर्म और पूजा की आड़ में बड़े-बड़े लज्जाजनक और घिनौने कृत्य होते हैं। साधु लोग अपनी ढोंग और ठग विद्या से गांव की भोली भाली महिलाओं को अपने मोह जाल में फांस लेते हैं। 

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के निर्माता आचार्य स्वामी दयानंद सरस्वती नंगे रहा करते थे। कैसी अजीब विडंबना है कि हिंदू समाज में नग्नता और अश्लीलता को धर्म और अध्यात्म का हिस्सा समझा जाता है। अजंता, एलोरा, कोणार्क, खजुराहों आदि मंदिरों में कामबंध प्रतिमाओं को हिंदू संस्कृति की धरोहर माना जाता है। इन मंदिरों के विषय में कवि रामधारी सिंह दिनकर (1908-1974) ने अपनी मुख्य पुस्तक ‘‘संस्कृति के चार अध्याय’’ में लिखा है, ‘‘कैसा रहा होगा वह समय और समाज, जिसके विश्वास की पताका, कोणार्क, पुरी, भुवनेश्वर और खजुराहों के मंडपों पर फहरा रही है ? मंडप के भीतर शिव और शक्ति की प्रतिमाएं और मंडप के ऊपर नर-नारी समागम की नग्न मूर्तियां और काम के कर्म-चित्र, जिनकी ओर भाई-बहन एक साथ आंखे उठाकर नहीं देख सकते। इन मूर्तियों को देखकर आज का जनमानस शर्माता है। क्या उन दिनों कोई जनमत नहीं था ? आज का जनमत जनता बनाती है, उस समय का जनमत साधु-संन्यासी, राजा और राजदरबारी तैयार करते थे।’’
आज हिंदू समाज में धार्मिक उपदेशों और प्रवचनकर्ताओं की बाढ़ सी आई हुई है। धार्मिक उपदेशों और प्रवचनों के नाम पर पेशेवर कथावाचक और उपदेशक किस्से-किवंदंतियों लोगों को सुनाते-समझाते हैं जिन्हें सुनकर श्रोतागण या तो भावुक हो रोने लगते हैं या फिर मन-मुग्ध हो नाचने-गाने लगते हैं। कथित उपदेशक जीवन जीने के ऐसे आसान रास्ते लोगों को बतलाते हैं जिससे न तो उनके जीवन की रोजमर्रा की लूट खसोट में रत्ती भर अंतर पड़ता है और न ही आचार-विचार में सुधार आता है। यहां सत्कर्म और आत्मशुद्धि को नहीं कर्मकांड को महत्व दिया जाता है जैसे गंगा में नहाने से सैकड़ों जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं, गाय की सेवा करने से मनुष्य करोड़ों-करोड़ों जन्मों के पापों से तर हो जाता है, गुरु सेवा और भक्ति से मनुष्य को परमेश्वर के दर्शन हो जाते हैं। वास्तविकता से कतई अनभिज्ञ भोली-भाली जनता तथाकथित परमपूज्यों के श्रीमुख से निकले शब्दों को ही अंतिम सत्य मान लेती है, क्योंकि परम पूज्यों से तर्क-वितर्क और संवाद करना पाप और अपराध समझा जाता है। धर्म के मामले में हम इतने अंधविश्वासी व रूढ़िवादी हैं कि धर्म से संबंधित किसी विषय के साथ क्या व क्यों जुड़ते ही हम भौचक्के से खड़े रह जाते हैं। जब हम विज्ञान और कानून आदि में तर्क-वितर्क कर सकते हैं तो धर्म में क्यों नहीं कर सकते?

हिंदू धार्मिक प्रतिमानों में ऊहापोह की विचित्र स्थिति देखने में आती है। महात्मा गौतम बुद्ध ने कहा ‘‘वेद-वेदान्त में सत्य का लवलेश तक नहीं है।’’ फिर भी बुद्ध देव को सबसे बड़ा वेदान्ती और हिंदुत्व का शोधक कहा गया। डॉ. अंबेडकर का चिंतन और दर्शन हिंदुत्व विरोधी रहा है। उन्होंने न केवल हिंदू धर्म की घोर निंदा और कटु आलोचना की है बल्कि उन्होंने मुनस्मृति में सार्वजनिक रूप से आग भी लगाई थी। डॉ. अंबेडकर (1891-1956) ने कहा था, ‘‘मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ हूँ, यह मेरे अधिकार में नहीं था, मगर मैं इस धर्म में मरूंगा नहीं।’’ इन परिस्थितियों में डॉ. अंबेडकर ने पाँच लाख व्यक्तियों के साथ 14 अक्टूबर सन् 1956 को बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। इसके बावजूद भी आज के हिंदू विद्वान और चिंतक डॉ. अंबेडकर को हिंदुत्व का प्रखर चिंतक, हितैषी और समर्थक कह रहे हैं। क्या यह विडंबना नहीं है ?
हिंदू धर्म में ईश्वरवाद और अनीश्वरवाद दोनों का, सर्वेश्वरवाद और बहुदेववाद दोनों का, आवागमन और परलोकवाद दोनों का, शाकाहार और मांसाहार दोनों का ऐसा अद्भुत समावेश किया गया है कि मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि यह एक प्राचीन सभ्यता का असीम औदार्य है या शेखचिल्लीपन। वेदों और उपनिषदों की आवाज एक नहीं है। रामायण और गीता एक दूसरे से भिन्न हैं। उत्तर का हिंदुत्व दक्षिण से भिन्न है। स्वामी दयानंद का हिंदुत्व स्वामी विवेकानन्द से भिन्न है। 19वीं सदी में जहां आर्य समाज के संस्थापक ने हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करते हुए मूर्ति पूजा, व्रत, उपवास, अवतारवाद, तीर्थयात्रा आदि को पाखंड और मूर्खतापूर्ण बताया वहीं रामकृष्ण परमहंस (1836-1886) और रामकृष्ण मिशन के संस्थापक कर्मठ वेदांती स्वामी विवेकानंद (1863-1902) ने समग्र हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करते हुए मूर्ति पूजा, व्रत, उपवास, अवतारवाद, तीर्थयात्रा आदि सभी को सार्थक और अनिवार्य बताया है। हिंदू धर्म की इतनी स्थापनाएं और उपस्थापनाएं हैं कि समझना और समझाना तथा इसकी कोई खूबी बयान करना अत्यंत मुश्किल काम है। 

कठोपनिषद् की उक्ति है, ‘‘न वित्तेनतर्पणीयों मनुष्यः।’’ मनुष्य धन दौलत से कभी तृप्त नहीं हो सकता। एक हदीस है, ‘‘अगर मनुष्य को सोने की एक घाटी दे दी जाए तो वह दूसरी की तमन्ना करेगा।’’ मगर मनुष्य सुख और सुकून के लिए धन-दौलत के पीछे आंख मूंदकर भाग रहा है। आज दौलत आदमी की सबसे बड़ी खूबी हो गई है। सद्गुण, सदभाव और सदाचार सब गुज़रे ज़माने की वस्तु बन गई है। आज मनुष्य जीवन की तुच्छताओं के गोरखधंधे में ऐसा उलझकर रह गया है कि उसे जीवन की वास्तविकता के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं है। जीवन की यह दारूण त्रासदी है कि जीवन के मूलभूत अभिप्राय को विस्मृत और उपेक्षित करके मनुष्य शारीरिक सुखभोग में लीन हो गया है, जबकि मानव जीवन में महत्वपूर्ण चीज़ अभीष्ट (Aim) है, शारीरिक सुखभोग नहीं। मौत की एक सख्ती मनुष्य जीवन की तमाम खुशियों और ऐशोआराम को खाक़ में मिला देती है। अतः सच यही है कि हम दुनिया की मूर्खतापूर्ण विलासिताओं में सिर के बल कूद-कूद कर कितने भी गोते लगा लें, अगर हमने जीवन के अभीष्ट (Aim) को तलाश नहीं किया तो हमारे जीवन का महत्व कीड़े-मकोड़ों से अधिक नहीं है। ईश्वरीय सत्ता की अवहेलना और जीवन के असल उद्देश्य की उपेक्षा हमें आर्थिक और वैज्ञानिक उन्नति के शिखर पर तो ले जा सकती है, मगर मनुष्य जीवन का अभीष्ट (Aim) प्राप्त नहीं करा सकती।

Monday, October 25, 2010

Arya Samaj: मरणोत्तर जीवन : तथ्य और सत्य

स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के नवम समुल्लास में आवागमनीय पुनर्जन्म की धारणा का प्रतिपादन करते हुए लिखा है, ‘‘पूर्व जन्म के पुण्य-पाप के अनुसार वर्तमान जन्म और वर्तमान तथा पूर्व जन्म के कर्मानुसार भविष्यत् जन्म होते हैं।’’ (9-73)
 इस विषय में लोगों ने स्वामी जी से कुछ प्रश्न भी किए हैं, जो निम्नवत् हैं :-
1. जन्म एक है या अनेक ? (9-67)
2. जन्म अनेक हैं तो पूर्व जन्म और मृत्यु की बातों का स्मरण क्यों नहीं रहता? (9-68)
3. मनुष्य और पश्वादि के ‘ारीर में जीव एक जैसा है या भिन्न-भिन्न जाति का? (9-74)
4. मनुष्य का जीव पश्वादि में और पश्वादि का मनुष्य के ‘ारीर में आता जाता है या नहीं? (9-75)
5. मुक्ति एक जन्म में होती है या अनेक में ? (9-76)
स्वामी जी उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर निम्न प्रकार देते हैं ः-
1. जन्म अनेक हैं।
2. जीव अल्पज्ञ है, त्रिकालदर्शी नहीं, इसलिए पूर्व जन्म का स्मरण नहीं रहता।
3. मनुष्य व पश्वादि में जीव एक सा है।
4. पाप-पुण्य के अनुसार मनुष्य का जीव पश्वादि में और पश्वादि का मनुष्य ‘ारीर में आता जाता है।
5. मुक्ति अनेक जन्मों में होती है।
मनुस्मृति के हवाले से स्वामी जी ने लिखा है ः-
‘‘स्थावराः कृमि कीटाश्च मत्स्याः सर्पाश्च कच्छपाः। पशवश्च मृगाश्चैव जघन्या तामसी गतिः।’’ (9-83)

भावार्थ ः ‘‘जो अत्यंत तमोगुणी है वो स्थावर वृक्षादि, कृमि, कीट, मत्स्य, सप्र्प, कच्छप, पशु और मृग के जन्म को प्राप्त होते हैं।’’
वेदों के पुरोधा और ‘ाोधक महर्षि दयानंद ने अपनी पुस्तक ऋग्वेदादि भाष्य-भूमिका के पुनर्जन्म अध्याय में पुनर्जन्म के समर्थन में ऋग्वेद मंडल-10 के दो मंत्रों के साथ अथर्ववेद व यजुर्वेद के मंत्र भी प्रस्तुत किए हैं ः-
1. ‘‘आ यो धर्माणि प्रथमः ससाद ततो वपूंषि कृणुषे पुरूणि।
धास्युर्योनि प्रथमः आ विवेशां यो वाचमनुदितां चिकेत’’।।
(अथर्व0 कां0-5, अनु0-1, मं0-2)
भाषार्थ ः ‘‘जो मनुष्य पूर्वजन्म में धर्माचरण करता है, उस धर्माचरण के फल से अनेक उत्तम ‘ारीरों का धारण करता है और अधर्मात्मा मनुष्य नीच ‘ारीर को प्राप्त होता। जो पूर्वजन्म में किए हुए पाप पुण्य के फलों को भोग करके स्वभावयुक्त जीवात्मा है वह पूर्व ‘ारीर को छोड़कर वायु के साथ रहता है, पुनः जल, औषधि व प्राण आदि में प्रवेश करके वीर्य में प्रवेश करता है। तदनन्तर योनि अर्थात गर्भाशय में स्थिर होकर पुनः जन्म लेता है। जो जीव अनूदित वाणी अर्थात जैसी ईश्वर ने वेदों में सत्य भाषण करने की आज्ञा दी है, वैसा ही यथावत् जान के बोलता है, और धर्म ही में यथावत स्थित रहता है, वह मनुष्य योनि में उत्तम ‘ारीर धारण करके अनेक सुखों को भोगता है और जो अधर्माचरण करता है वह अनेक नीच ‘ारीर अथवा कीट, पतंग, पशु आदि के ‘ारीर को धारण करके अनेक दुखों को भोगता है।’’
2. ‘‘द्वे सतीऽ अशृणावं पितृणामहं देवानामुत मत्र्यानाम्।
ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं च।।’’
(यजु0 अ0-19, मं0-47)
भाषार्थ ः ‘‘इस संसार में हम दो प्रकार के जन्मों को सुनते हैं। एक मनुष्य ‘ारीर का धारण करना और दूसरा नीच गति से पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि का होना। इनमें मनुष्य ‘ारीर के तीन भेद हैं, एक पितृ अर्थात् ज्ञानी होना, दूसरा देव अर्थात् सब विधाओं को पढ़कर विद्वान होना, तीसरा मत्र्य अर्थात् साधारण मनुष्य का ‘ारीर धारण करना। इनमें प्रथम गति अर्थात् मनुष्य ‘ारीर पुण्यात्माओं और पुण्यपाप तुल्य वालों का होता है और दूसरा जो जीव अधिक पाप करते हैं उनके लिए है। इन्हीं भेदों से सब जगत् के जीव अपने-अपने पुण्य और पापों के फल भोग रहे हैं। जीवों को माता और पिता के ‘ारीर में प्रवेश करके जन्म धारण करना, पुनः ‘ारीर का छोड़ना, फिर जन्म को प्राप्त होना, बारंबार होता है।’’
यहाँ एक बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि कभी सृष्टि का प्रारम्भ तो अवश्य हुआ होगा, चाहेे वह करोड़ों साल पहले हुआ हो, सृष्टि के प्रारम्भ में मनुष्य के जन्म का सैद्धान्तिक आधार क्या था ? जैसा कि स्वामी जी ने लिखा है कि ‘‘प्रथम सृष्टि के आदि में परमात्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा इन ऋषियों की आत्मा में एक-एक वेद का प्रकाश किया। (7-86) आगे क्रम सं0 88 में लिखा है कि वे ही चार सब जीवों से अधिक पवित्रात्मा थे, अन्य कोई उनके सदृश नहीं था। यहाँ सवाल यह है कि सृष्टि के आदि में पूर्व पुण्य कहाँ से आया? इस सवाल का कोई तर्कपूर्ण और न्यायसंगत जवाब स्वामी जी ने अपने ग्रंथों में कहीं नहीं लिखा।
स्वामी जी ने स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, परलोक चार ‘ाब्दों की गलत और भ्रामक व्याख्या की है। नवम समुल्लास के क्रम सं0 79 में लिखा है कि सुख विशेष स्वर्ग और विषय तृष्णा में फंसकर दुःख विशेष भोग करना नरक कहलाता है। जो सांसारिक सुख है वह स्वर्ग और जो सांसारिक दुःख है वह नरक है। जबकि वैदिक धारणा और ‘ाब्दकोष के अनुसार स्वर्ग और नरक स्थान विशेष का नाम है। इसी प्रकार पुनः का अर्थ दोबारा है न कि बार-बार। जैसे पुनर्विवाह, पुनर्निर्माण वैसे ही पुनर्जन्म। चतुर्थ समुल्लास में स्वामी दयानंद ने मनुस्मृति के कुछ ‘लोकों द्वारा परलोक के सुख हेतु उपाय बताए हैं। यहाँ स्वामी जी ने परलोक और परजन्म दोनों को एक ही अर्थ में लिया है। (4-106) मनुस्मृति के जो ‘लोक उन्होंने उद्धरित किए हैं वे परलोक की सफलता पर केन्द्रित हैं न कि आवागमनीय पुनर्जन्म पर। स्वामी जी की धारणाओं और तथ्यों में प्रचुर विरोधाभास पाया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वेद विषयों पर स्वामी जी की जानकारी संदिग्ध थी।
मनुष्य चाहे जन्मना हिंदू हो, यहूदी हो, ईसाई हो या मुसलमान या अन्य किसी धर्म, मत व पंथ को मानने वाला हो, सबके जीवन का मूल स्रोत एक ही है। सब एक माँ-बाप की संतान हैं, सब परस्पर भाई-भाई हैं। यह तथ्य न केवल वेद और कुरआन सम्मत है बल्कि विज्ञान सम्मत भी है। इसके साथ एक सर्वमान्य तथ्य यह भी है कि मनुष्य चाहे एक हजार साल जिन्दा रहे, उसकी मृत्यु सुनिश्चित है। मृत्यु जीवन की अनिवार्य नियति है। इस नियति से जुड़ा है मानव जीवन का एक बड़ा अहम सवाल कि हमें मृत्युपरांत कहाँ जाना है ? मृत्युपरांत हमारा क्या होगा ? इस एक अहम सवाल से जुड़ी है हमारे जीवन की सारी आध्यात्मिकता ;ैचपतपजनंसपजल) और सर्वांग सम्पूर्णता। आइए इस अहम विषय पर एक तथ्यपरक दृष्टि डालते हैं।
जड़वादियों (डंजमतपंसपेजे) का मानना है कि यहीं आदि है और यही अंत है। (क्मंजी पे मदक व िसपमि) ‘‘भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।’’ देह भस्म हो गया फिर आना-जाना कहाँ ? अनीश्वरवादी (।जीमपेज) महात्मा गौतम बुद्ध ने कहा, ‘‘भला करो, भले बनो, मृत्युपरांत क्या होगा यह प्रश्न असंगत है, अव्याकृत है।’’ हिंदूवादियों (च्वसलजीमपेज) का मानना है कि वनस्पति, पशु-पक्षी और मनुष्यादि में जीव (ैवनस) एक सा है और कर्मानुसार यह जीव (ैवनस) वनस्पति योनि, पशु योनि और मनुष्य योनि में विचरण करता रहता है। जीवन-मरण की यह अनवरत श्ाृंखला है। रामचरितमानस के लेखक गोस्वामी तुलसीदास के मतानुसार कुल चैरासी लाख योनियों में 27 लाख स्थावर, 9 लाख जलचर, 11 लाख पक्षी, 4 लाख जानवर और 23 लाख मानव योनियाँ हैं। हिंदू धर्मदर्शन के मनीषियों ने इस अवधारणा को आवागमनीय पुनर्जन्म का नाम दिया है।
इस अवधारणा (ब्लबसम व िठपतजी - क्मंजी) के संदर्भ में हिंदू धर्मदर्शन के चिंतकों का एक मजबूत तीर व तर्क है कि संसार में कोई प्राणी अंधा जन्मता है, कोई गंूगा और लंगड़ा जन्मता है। कोई प्रतिभाशाली तो कोई निपट मूर्ख जन्मता है। यहाँ कोई खूबसूरत है, कोई बदसूरत है। कोई निर्धन है तो कोई धनवान है। कोई हिंदू जन्मता है तो कोई मुसलमान जन्मता है। कोई ऊँची जात है तो कोई नीची जात है। जन्म के प्रारम्भ में ही उक्त विषमताएं पिछले जन्म का फल नहीं तो और क्या हैं ? इसी धारणा के साथ हिंदू मनीषियों की यह भी मान्यता है कि मनुष्य योनि पूर्व जन्म के अच्छे कर्माें से मिलती है। ‘‘बड़े भाग मानुष तनु पाया’’। यहाँ हिंदू चिंतकों के उक्त दोनों तथ्यों में असंगति स्पष्ट प्रतीत होती है।
अगर यह मान लिया जाए कि यहाँ की सभी विषमताएं पूर्वकृत कर्माें का लेखा है। एक मनुष्य दूसरे को इसलिए मार रहा है कि उसने पिछले जन्म में उसे मारा है। एक मनुष्य यहाँ इसलिए जुल्म कर रहा है कि पिछले जन्म में उस पर जुल्म किया गया है। फिर तो यह एक युक्तियुक्त स्थिति है। अगर यह मान्यता सत्य है फिर तो मामला सस्ते में ही निपट जाता है। फिर तो इस विषमता को दूर करने के सारे प्रयास न केवल बेकार हैं बल्कि प्रयास करना ही बेवकूफी है। यहाँ जो हो रहा है सब कुछ तर्कसंगत और न्यायसंगत है। लूटमार, मारकाट, अनाचार, अत्याचार यदि सभी कुछ पूर्व कर्माें का फल है तो फिर न कोई पाप-पुण्य का आधार बनता है न ही सही-गलत बाकी रहता है। यहाँ यह विचारणीय है कि यदि मनुष्य योनि पूर्व जन्म के अच्छे कर्माें से मिलती है तो फिर कोई जन्म से अंधा, बहरा, लंगड़ा और जड़बुद्धि क्यों ? दूसरा विचारणीय तथ्य है कि यदि इस जन्म की अपंगता पिछली योनि के कर्माें का फल है तो न्याय की मांग है कि दण्डित व्यक्ति को यह जानकारी होनी चाहिए कि उसने पूर्वजन्म में किस योनि में क्या पाप व दुष्कर्म किया है जिसके कारण उसे यह सजा मिली है ताकि सुधार की सम्भावना बनी रहे। अगर अपंग व्यक्ति को पूर्व योनि में किए दुष्कर्म और पापकर्म का पता नहीं है और सत्य भी यही है कि उसे कुछ पता नहीं है तो क्या आवागमनीय पुनर्जन्म की धारणा पूर्णतया भ्रामक और कतई मिथ्या नहीं हो जाती ?
आज अध्यात्म को छोड़ हम अधिभूत में डूबते जा रहे हैं। एक तरफ नैतिक पतन की पराकाष्ठा, अनाचार, अत्याचार, बिगाड़ बढ़ता जा रहा है, दूसरी तरफ उत्तम और दुर्लभ मनुष्य योनि (च्वचनसंजपवद) बढ़ती जा रही है। किस तरह समझें इस पूर्वजन्म और पुनर्जन्म को ? विज्ञान इस तथ्य की तह तक पहुंच गया है कि इस सृष्टि का आदि भी है और अंत भी है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार सृष्टि का प्रारम्भ एक महाविस्फोटक (ठपह ठंदह ज्ीमवतल) से हुआ और अंत भी इसी प्रकार होगा। फिर जन्म-मरण की अनवरत श्ाृंखला को कैसे सत्य माना जा सकता है ?
आवागमनीय पुनर्जन्म की अवधारणा का तीन तत्वः जीवन तत्व (स्पमि), चेतन तत्व (ब्वदेबपवनेदमेे) और आत्म तत्व ;ैवनस) के आधार पर वैज्ञानिक विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि वनस्पतियों में केवल जीवन तत्व (स्पमि) होता है, चेतन तत्व (ब्वदेबपवनेदमेे) और आत्म तत्व (ैवनस) नहीं होता। यदि वनस्पतियों में भी वही चेतन तत्व (ब्वदेबपवनेदमेे) होता जो पशु-पक्षियों में होता है, तो फिर वनस्पतियों का भक्षण भी उसी प्रकार पाप व अपराध होता जिस प्रकार तथाकथित पुनर्जन्मवादी पशु-पक्षियों का मांस खाने में मानते हैं। अब यदि जीव-जन्तुओं और पशु-पक्षियों में भी वही चेतन तत्व ;डवतंस ैमदेम) और आत्म तत्व (ैवनस) होता जो मनुष्य में है तो पशु-पक्षियों को मारना भी उतना ही पाप व अपराध होता जितना मनुष्यों को मारने में होता है। पेड़-पौधों और पशुओं में वह चेतन तत्व व आत्म तत्व नहीं होता जो कर्म कराता है और कर्मफल भोगने का कारण बनता है। वृक्ष-वनस्पति और पशुओं में केवल इनकमिंग सुविधा है जबकि मनुष्यों में इनकमिंग के साथ-साथ आउट गोइंग सुविधा भी है जिससे कर्म लेखा (।बबवनदज व िक्ममके) तैयार होता है। मनुष्य इसलिए तो सर्वश्रेष्ठ प्राणी है कि परम तत्व (ळवकद्ध ने उसे विवेक (ॅपेकवउद्ध और विचार (ज्ीपदापदह) प्रदान किया है जो किसी अन्य को नहीं किया है। जहाँ जीवन है वहाँ चेतना और आत्मा का होना अनिवार्य नहीं। आत्मा (ैवनस), चेतना (ब्वदेबपवनेदमेे) और प्रज्ञा (ज्ञदवूसमकहम) वहीं है जहाँ कर्म (त्पहीज ंदक ॅतवदह क्ममके) है। पशुओं में नींद, भूख, भय और मैथुन आदि दैहिक क्रियाएं (च्ीलेपबंस च्तवबमेे) तो है मगर विवेक संबंधी क्रियाएं ;म्जीपबंस च्तवबमेेद्ध नहीं है। मनुष्य आत्मा ;ैवनसद्ध में ही ज्ञानत्व, कर्तृत्व और भौक्तृत्व ये तीनों निहित हैं। इसलिए वेद और कुरआन मनुष्य जाति के लिए है न कि पशु और वनस्पति जगत के लिए।
कीट-पतंगे और पशु पक्षी नैसर्गिक जीवन व्यतीत करते हैं। एक वृक्ष और एक पशु को यह विवेक नहीं दिया गया है कि वे इस विशाल ब्रह्मांड में अपने अस्तित्व का कारण तलाश करें। पशुओं के सामने न कोई अतीत होता है न कोई भविष्य। भय, भूख, नींद, मैथुन आदि क्रियाओं के होते हुए भी पशु एक बेफिक्र रचना ;ब्ंतमसमेे ब्तमंजनतम) है, चेतनाहीन ;प्द ं ैजंजम व िैजनचपकद्ध कृति है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी तो मनुष्य जीवन की सामग्री मात्र है। इनकी रचना को मनुष्य योनि के पाप-पुण्य से जोड़ना नादानी की बात है।
देखने और सुनने की क्षमता के बावजूद एक बकरी कसाई और चरवाहे में फ़र्क नहीं करती। देखने और सुनने की क्षमता के बावजूद एक गाय मालिक और दुश्मन के खेत में अंतर नहीं करती। इससे सुस्पष्ट है कि पश्वादि में आत्मचेतना (डवतंस डपदक) नहीं होती। विवेक ;ॅपेकवउद्ध और विचार (ज्ीपदापदहद्ध नहीं होता। जब पश्वादि में न विवेक है, न विचार है, न कोई आचार संहिता ;ब्वकम व िब्वदकनबजद्ध है तो फिर कर्म और कर्मफल कैसा ? विचित्र विडंबना है कि हिंदू धर्म दर्शन ने पेड़-पौधों, पशुओं और मनुष्य को एक ही श्रेणी में रखा है। क्या यह अवधारणा तर्कसंगत और न्यायसंगत हो सकती है कि एक योनि चिंतन (ज्ीपदापदह च्वूमत) और चेतना ;डवतंस ैमदेमद्ध रखने के बावजूद चिंतनहीन (ज्ीवनहीजसमेे) और चेतना विहीन (न्दबवदेबपवनेदमेे) योनि में अपने कर्माें का फल भोगे ? कैसी अजीब धारणा है कि पाप कर्म करें मनुष्य और फल भोगे गधा और विवेकहीन वृक्ष?
यहाँ यह भी विचारणीय है कि दण्ड और पुरस्कार का सीधा संबंध विवेक, विचार और कर्म से है। दूसरी बात बिना पेशी, बिना गवाह, बिना सबूत, बिना प्रतिवादी कैसी अदालत, कैसा न्याय ? एक व्यक्ति को बिना किसी चार्जशीट के अंधा, लंगड़ा, जड़बुद्धि बना दिया जाए या कीट, कृमि, कुत्ता बना दिया जाए या पशु को मनुष्य बना दिया जाए, यह कैसा इंसाफ, कैसा कानून ? क्या इसे कोई कानून कहा जा सकता है ? न्यायसंगत और तर्कसंगत तो यह है कि फल भोगने वाले को सजा या पारितोष का एहसास हो और यह तभी सम्भव है कि जब कर्म करने वाला उसी ‘ारीर व चेतना के साथ फल भोगे, जिस ‘ारीर व चेतना के साथ उसने कर्म किया है।
उपर्युक्त तथ्यों और तर्काें से सिद्ध हो जाता है कि आवागमनीय पुनर्जन्म की धारणा एक अबौद्धिक और अवैज्ञानिक धारणा है। इस मिथ्या व कपोल-कल्पित मान्यता ने करोड़ों मनुष्यों को जीवन के मूल उद्देश्य से भटका दिया है। यह धारणा मनुष्य जीवन का कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं करती। मनुष्य के सामने कोई उच्च लक्ष्य न हो, कोई दिशा न हो तो वह जाएगा कहाँ ? विचित्र विडंबना है कि जीवन है मगर कोई जीवनोद्देश्य नहीं है। बिना किसी जीवनोद्देश्य के साधना और साधन सब व्यर्थ हो जाता है। यात्रा में हमारे पास कितनी भी सुख-सुविधा, सामग्री, साधन हो, मगर यह पता न हो कि जाना कहाँ है ? हमारी दिशा, हमारी मंजिल, हमारा गंतव्य क्या है तो हम जाएंगे कहाँ ? दिशा और गंतव्य निश्चित हो तभी तो गंतव्य की दिशा की तरफ चला जा सकता है। अगर दिशा का भ्रम हो तो मनुष्य कभी सही दिशा की तरफ नहीं बढ़ सकता। एक व्यक्ति दौड़ा जा रहा है और उसे पता न हो कि किधर और कहाँ जाना है तो क्या लोग उसे बेवकूफ नहीं कहेंगे?
हमारे जीवन में भौतिक कारणों, अकारणों का बड़ा महत्व है। यहाँ किसी का विकलांग, निर्धन, रोगी अथवा स्वस्थ, सुन्दर और धनी होना पिछले कर्माें का प्रतिफल नहीं है। यह विषमता भौतिक, प्राकृतिक और सामाजिक असंतुलन का परिणाम है। कभी चेचक व पोलियों आदि बीमारियों को मनुष्य का भाग्य और पूर्वजन्म का फल समझा जाता था मगर आज वैज्ञानिक प्रयोगों और प्रयासों द्वारा मनुष्य ने इन पर विजय प्राप्त कर ली है। यहाँ के परिणाम किसी पूर्वकृत योनियों के सत्कर्म या पाप कर्म के परिणाम नहीं हैं। यहाँ की विषमता को समझने के लिए हमें सृष्टिकर्ता की योजना (ब्तमंजपवद च्संद व िळवक) को भी समझना होगा।
ब्रह्मांड की विशालता, एक सूत्रता और दिन-रात का प्रत्यावर्तन बता रहा है कि यह सृष्टि (ब्तमंजपवदद्ध किसी तीर-तुक्के की परिणति नहीं है, इसमें स्रष्टा (ब्तमंजवत) का कोई उच्च प्रयोजन छिपा है। हम इहलोक में देखते हैं कि अक्सर बेइमान, स्वार्थी, धूर्त लोग फल फूल रहे हैं, ईमानदार, गरीब, श्रमजीवी लोग पिस रहे हैं। दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों का फूलना-फलना न्याय और नीति की बात नहीं हो सकती। कुकृत्यों की परिणति सुखदायी कभी नहीं हो सकती। अतः स्पष्ट है कि कुकृत्यों के परिणाम यहाँ प्रकट नहीं हो रहे हैं। न्याय और प्रतिहार के लिए यह संसार अपूर्ण है। बुद्धि की मांग है कि कोई ऐसी जगह (च्संबम व िश्रनकहमउमदज) हो जहाँ दुष्कर्मी और अत्याचारी व्यक्ति के कर्मों का पूर्ण विवरण मय गवाह व सबूतों के प्रस्तुत हो और पीड़ित व्यक्ति अपनी आंखों के सामने उसे दण्ड और सजा भोगते देखें। वर्तमान लोक में ऐसी न्याय व्यवस्था (श्रनकपबंजनतम) की कतई कोई सम्भावना नहीं है। अतः पूर्ण और निष्पक्ष न्याय के लिए आवश्यक है कि जब सम्पूर्ण मानवता का कृत्य समाप्त हो जाए तो एक नई दुनिया में हमारा पुनर्जन्म (त्म.पदबंतदंजपवद) हो अथवा हमें पुनर्जीवन (त्मेनततमबजपवद) प्राप्त हो। हिंदू मनीषियों ने पुनर्जन्म (त्म.पदबंतदंजपवद) को गलत अर्थों में परिभाषित किया है। पुनर्जन्म ‘ाब्द का अर्थ बार-बार जन्म लेने से कदापि नहीं है। पुनर्जन्म ‘ाब्द का अर्थ एक बार न्याय के दिन (क्ंल व िश्रनकहमउमदज) जन्म लेने से है। हिंदू धर्म ग्रंथों में प्रलय, पितर लोक, परलोक, स्वर्ग, नरक आदि ‘ाब्दों का बार-बार प्रयोग उक्त तथ्य की पुष्टि करता है।
यह जगत एक क्रियाकलाप (।बजपअंजपवद) है। तैयारी (म्गंउपदंजपवद) है, एक दिव्य जीवन के लिए, पारलौकिक जीवन के लिए। सांसारिक अभ्युद्य मानव जीवन का लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य है पारलौकिक जीवन की सफलता। भौतिक सुख-सुविधा सामग्री केवल जरूरत मात्र है। यहाँ जब हम वह कुछ हासिल कर लेते हैं जो हम चाहते हैं, तो हमारे मरने का वक्त करीब आ चुका होता है। हम बिना किसी निर्णय, न्याय, परिणाम के यहाँ से विदा हो जाते हैं। धन, दौलत, बच्चें आदि सब यही रह जाता है। अगर हम यह मानते हैं कि जो कर्म हमने यहाँ किए हैं, उनके परिणाम स्वरूप हम जीव-जन्तु, पेड़- पौधा या मनुष्य बनकर पुनः इहलोक में आ जाएंगे तो यह एक आत्मवंचना (ैमस िक्मबमचजपवद) है। हमें इस धारणा की युक्ति-युक्तता पर गहन और गम्भीर चिंतन करना चाहिए। पारलौकिक जीवन की सफलता मानव जीवन का अभीष्ट (क्मेपतमक) है। यही है मूल वैदिक और कुरआनी अवधारणा और साथ-साथ बौद्धिक और वैज्ञानिक भी।

Saturday, September 18, 2010

Arya Samaj - अहिंसा परमो धर्मः ?

‘योग सूत्र’ के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग के आठ अंगों का वर्णन किया है। योग का पहला अंग ‘यम’ है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन पाँच को योग दर्शन में ‘यम’ कहा गया है।

‘अहिंसा सत्या स्तेय ब्रह्मचर्या परिग्रहा यमाः। (योग दर्शन, 2-30)


जैन मत में उक्त पाँचों को व्रत कहा गया है। अहिंसा जैन मत का मुख्य तत्व है। यहाँ अहिंसा का मतलब किसी प्राणी को बिना किसी उद्देश्य के नुकसान न पहुंचाना है। निष्प्रयोजन किसी प्राणी की हत्या करना या चोट पहुंचाना यहाँ तक कि क्लेश पहुंचाना एवं आत्मभाव पर आघात करना हिंसा है। निष्प्रयोजन किसी पेड़ की टहनियाँ तोड़ना भी हिंसा के अन्तर्गत आता है। मगर कुछ पंथों के प्रणेताओं ने हिंसा की मनमानी व्याख्या की है। ‘‘अहिंसा परमो धर्मः’ का नारा देने वालों का कहना है कि किसी भी प्रकार की हिंसा पाप है चाहे वह प्रयोजनीय हो या निष्प्रयोजनीय। उक्त नारे का मूल निहितार्थ मांस भक्षण को निषिद्ध व पाप ठहराना था। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी के बाद महात्मा बुद्ध ने भी अहिंसा का उपदेश दिया।

गौतम बुद्ध का जन्म एक क्षत्रिय परिवार में 563 ई0पू0 लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। लुम्बिनी कपिलवस्तु के पड़ोस में है। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ श्रेष्ठतर जीवन मूल्यों की तलाश में 29 वर्ष की आयु में घर से निकल गए। 6 वर्ष तक सच्चाई की तलाश में भटकते हुए एक दिन उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ और वे सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बन गए। गौतम बुद्ध के बाद भारतीय चिंतन में एक तूफ़ान-सा आ गया था, क्योंकि गौतम बुद्ध का सीधा टकराव वैदिक ब्राह्मणों से था।


वैदिक ब्राह्मण यज्ञ को प्रथम और उत्तम वैदिक संस्कार समझते थे। यह आर्यों का मुख्य धार्मिक कृत्य था। पशु बलि यज्ञ का मुख्य अंग थी। पशु बलि को बहुत ही पुण्य का कर्तव्य समझा जाता था। गौतम बुद्ध ने जब देखा कि आर्य लोग यज्ञ में निरीह पशुओं की बलि चढ़ाते हैं, तो यह देखकर उनका हृदय विद्रोह से भर उठा। आर्य धर्म के विरूद्ध उठने वाली क्रांति का प्रमुख कारण वैदिक पुरोहितवाद और हिंसा पूर्ण कर्मकांड ही था। 
 ईसा से करीब 500 वर्ष पहले गौतम बुद्ध ने वैदिक धर्म पर जो सबसे बड़ा आरोप लगाया था वह यह था कि, 
‘‘पशु बलि का पुण्य कार्य और पापों के प्रायश्चित से क्या संबंध ? पशु बलि धर्माचरण नहीं जघन्य पाप व अपराध है ?’’
यह एक विडंबना ही है कि गौतम बुद्ध के करीब 2350 वर्ष बाद आर्य समाज के संस्थापक, वेदों के प्रकांड पंडित स्वामी दयानंद सरस्वती ने इस्लाम पर जो सबसे बड़ा आरोप लगाया है वह यह है कि 
‘‘यदि अल्लाह प्राणी मात्र के लिए दया रखता है तो पशु बलि का विधान क्यों कर धर्म-सम्मत हो सकता है ? पशु बलि धर्माचरण नहीं जघन्य पाप व अपराध है।’’ 
कैसी अजीब विडंबना है कि जो सवाल गौतम बुद्ध ने वैदिक ऋषियों से किया था, वही सवाल करीब 2350 वर्ष बाद एक वैदिक महर्षि मुसलमानों से करता है। जो आरोप गौतम बुद्ध ने आर्य धर्म पर लगाया था, वही आरोप कई ‘शताब्दियों बाद एक आर्य विद्वान इस्लाम पर लगाता है।

धर्म का संपादन मनुष्य द्वारा नहीं होता। धर्म सृष्टिकर्ता का विधान होता है। धर्म का मूल स्रोत आदमी नहीं, यह अति प्राकृतिक सत्ता है। यह भी विडंबना ही है कि गौतम बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व का इंकार करके वैदिक धर्म को आरोपित किया था, मगर स्वामी दयानंद सरस्वती ने ईश्वर के अस्तित्व का इकरार करके इस्लाम को आरोपित किया है। 

प्राचीन भारतीय समाज में पशु बलि के साथ-साथ नर बलि की भी एक सामान्य प्रक्रिया थी। यज्ञ-याग का समर्थन करने वाले वैदिक ग्रंथ इस बात के साक्षी हैं कि न केवल पशु बलि बल्कि नर बलि की प्रथा भी एक ठोस इतिहास का परिच्छेद है। यज्ञों में आदमियों, घोड़ों, बैलों, मेंढ़ों और बकरियों की बलि दी जाती थी। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मुख्य पुस्तक ‘‘संस्कृति के चार अध्याय’’ में लिखा है कि यज्ञ का सार पहले मनुष्य में था, फिर वह अश्व में चला गया, फिर गो में, फिर भेड़ में, फिर अजा में, इसके बाद यज्ञ में प्रतीकात्मक रूप में नारियल-चावल, जौ आदि का प्रयोग होने लगा। आज भी हिंदुओं के कुछ संप्रदाय पशु बलि में विश्वास रखते हैं। 


वेदों के बाद अगर हम रामायण काल की बात करें तो यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि श्री राम शिकार खेलते थे। जब रावण द्वारा सीता का हरण किया गया, उस समय श्री राम हिरन का शिकार खेलने गए हुए थे। उक्त तथ्य के साथ इस तथ्य में भी कोई विवाद नहीं है कि श्रीमद्भागवतगीता के उपदेशक श्री कृष्ण की मृत्यु शिकार खेलते हुए हुई थी। यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि क्या उक्त दोनों महापुरुष हिंसा की परिभाषा नहीं जानते थे ? क्या उनकी धारणाओं में जीव हत्या जघन्य पाप व अपराध नहीं थी ? क्या शिकार खेलना उनका मन बहलावा मात्र था ?

अगर हम उक्त सवाल पर विचार करते हुए यह मान लें कि पशु बलि और मांस भक्षण का विधान धर्मसम्मत नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्‍वर अत्यंत दयालु और कृपालु है, तो फिर यहाँ यह सवाल भी पैदा हो जाता है कि जानवर, पशु, पक्षी आदि जीव हत्या और मांस भक्षण क्यों करते हैं। अगर अल्लाह की दयालुता का प्रमाण यही है कि वह जीव हत्या और मांस भक्षण की इजाजत कभी नहीं दे सकता तो फिर शेर, बगुला, चमगादड़, छिपकली, मकड़ी, चींटी आदि जीवहत्या कर मांस क्यों खाते हैं ? क्या शेर, चमगादड़ आदि ईश्वर की रचना नहीं है ?


शेर को जंगल का राजा कहा जाता है, वह जानवरों पर इतनी बेदर्दी और बेरहमी से हमला करता है कि जानवर दहाड़ मारने लगता है। मांसाहारी चमगादड़ों की एक बस्ती में लगभग 2 करोड़ तक चमगादड़ें होती हैं। अगर चमगादड़ की एक बस्ती के एक रात के भोजन का अनुमान लगाये तो 2 करोड़ की एक बस्ती एक रात में करीब 2500 कुंतल कीड़ों, कीटों आदि को चट कर जाती हैं। अगर इन कीड़ों, कीटों की तादाद का अनुमान लगाया जाए तो यह तादाद करीब 1000 करोड़ से अधिक होती है। यह तो एक मामूली-सा उदाहरण मात्र है, यह दुनिया बहुत बड़ी है और इस जमीनी दुनिया से कहीं अधिक विस्तृत और विशाल तो समुद्री दुनिया है जहाँ एक जीव पूर्ण रूप से दूसरे जीव पर निर्भर है।

विश्व के मांस संबंधी आंकड़ों पर अगर हम एक सरसरी नज़र डालें तो आंकड़े बताते हैं कि प्रतिदिन 8 करोड़ मुर्गियां, 22 लाख सुअर, 13 लाख भेड़-बकरियां, 7 लाख गाय, करोड़ों मछलियां और अन्य पशु-पक्षी मनुष्य का लुकमा बन जाते हैं। कई देश तो ऐसे हैं जो पूर्ण रूप से मांस पर ही निर्भर हैं। अब अगर मांस भक्षण को पाप व अपराध मान लिया जाए तो न केवल मनुष्य का जीवन बल्कि सृष्टि का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जीव-हत्या को पाप मानकर तो हम खेती-बाड़ी का काम भी नहीं कर सकते, क्योंकि खेत जोतने और काटने में तो बहुत अधिक जीव-हत्या होती है।


विज्ञान के अनुसार पशु-पक्षियों की भांति पेड़-पौधों में भी जीवन Life है। अब जो लोग मांस भक्षण को पाप समझते हैं, क्या उनको इतनी-सी बात समझ में नहीं आती कि जब पेड़-पौधों में भी जीवन है तो फिर उनका भक्षण जीव-हत्या क्यों नहीं है? फिर मांस खाने और वनस्पति खाने में अंतर ही क्या है ? यहाँ अगर जीवन Life ; और जीव Soul; में भेद न माना जाए तो फिर मनुष्य भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों की श्रेणी में आ जाता है। जीव केवल मनुष्य में है इसलिए ही वह अन्यों से भिन्न और उत्तम है।

विज्ञान के अनुसार मनुष्य के एक बार के वीर्य Male generation fluid स्राव (Discharge) में 2 करोड़ ‘शुक्राणुओं (Sperm) की हत्या होती है। मनुष्य जीवन में एक बार नहीं, बल्कि सैकड़ों बार वीर्य स्राव करता है। फिर मनुष्य भी एक नहीं करोड़ों हैं। अब अगर यह मान लिया जाए कि प्रत्येक ‘शुक्राणु (Sperm) एक जीव है, तो इससे बड़ी तादाद में जीव हत्या और कहां हो सकती है ? करोड़ों-अरबों जीव-हत्या करके एक बच्चा पैदा होता है। अब क्या जीव-हत्या और ‘‘अहिंसा परमों धर्मः’’ की धारणा तार्किक और विज्ञान सम्मत हो सकती है।


 जहाँ-जहाँ जीवन है वहाँ-वहाँ जीव (Soul) हो यह ज़रूरी नहीं। वृद्धि- ह्रास , विकास जीवन (Life) के लक्षण हैं जीव के नहीं। आत्मा वहीं है जहाँ कर्म भोग है और कर्म भोग वही हैं जहाँ विवेक (Wisdom) है। पशु आदि में विवेक नहीं है, अतः वहां आत्मा नहीं है। आत्मा नहीं है तो कर्म फल भोग भी नहीं है। आत्मा एक व्यक्तिगत अस्तित्व (Cosmic Existence) है जबकि जीवन एक विश्वगत अस्तित्व (Individual Existence) है। पशु और वनस्पतियों में कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं होता। अतः उसकी हत्या को जीव हत्या नहीं कहा जा सकता। जब पशु आदि में जीव (Soul) ही नहीं है, तो जीव-हत्या कैसी ? पशु आदि में सिर्फ और सिर्फ जीवन है, जीव नहीं। अतः पशु-पक्षी आदि के प्रयोजन हेतु उपयोग को हिंसा नहीं कहा जा सकता।

Friday, September 17, 2010

Arya Samaj - ख़तना और पेशाब

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के रचयिता ने लिखा है कि अगर ख़तना कराना ईश्वर को इष्ट होता तो वह ईश्वर उस चमड़े को आदि सृष्टि में बनाता ही क्यों ? और जो बनाया है वह रक्षार्थ है जैसा आँख के ऊपर चमड़ा। वह गुप्त स्थान अति कोमल है जो उस पर चमड़ा न हो तो एक चींटी के काटने और थोड़ी चोट लगने से बहुत सा दुःख होवे और लघुशंका के पश्चात् कुछ मूत्रांश कपड़ों में न लगे आदि बातों के लिए ख़तना करना बुरा है। ईसा की गवाही मिथ्या है, इसका सोच-विचार ईसाई कुछ भी नहीं करते। (13-31)

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के लेखक का यह कहना कि अगर ख़तना कराना ईश्वर को पसंद होता तो वह चमड़ा ऊपर लगाता ही क्यों? यह कोई बौद्धिक तर्क नहीं है? सृष्टिकर्ता ने मनुष्य को नंगा पैदा किया है, इसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि मनुष्य कपड़े ना पहने, नंगा ही जिये, नंगा ही मरे, गंदा पैदा होता है, गंदा ही रहे। नाखून और बाल आदि भी न कटवाए। दूसरी बात यह कि सृष्टिकर्ता ने चींटी व चोट आदि से सुरक्षा हेतु झिल्ली की व्यवस्था की है। जिस चमड़ी की व्यवस्था सृष्टिकर्ता ने की है वह चमड़ी या झिल्ली न चींटीं रोधक है और न ही चोट रोधक। वह झिल्ली स्वयं इतनी अधिक कोमल है कि उसे खुद सुरक्षा की आवश्यकता है। तीसरी बात कि लघुशंका के पश्चात् कुछ मूत्रांश कपड़ों पर न लगे इसलिए झिल्ली की व्यवस्था की गई है। झिल्ली में कोई सोखता तो लगा नहीं कि वह मूत्रांश को अपने अंदर सोख लेगा। झिल्ली होने से तो और अधिक मूत्रांश झिल्ली में रूकेगा और कपड़ों को गीला और गंदा करेगा। यह तो एक साधारण सी बात है इसमें किसी शोध की भी आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक पेशाब की बात है पेशाब शरीर की गंदगी है, इसे धोया जाए तो नुकसान ही क्या है? मगर लेखक ने पेशाब धोने की बात कहीं नहीं लिखी है, जबकि हिंदू ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। एक उदाहरण देखिए -
एका लिंगे गुदे तिस्रस्तथैकत्र करे दश ।
उभयोः सप्त दातव्याः मृदः शुद्धिमभीप्सता ।।
(मनु, 5-139)
भावार्थ - शुद्धि के इच्छुक व्यक्ति को मूत्र करने के उपरांत लिंग पर एक बार जल डालना चाहिए । मलत्याग के उपरांत गुदा पर तीन बार मिट्टी मलकर दस बार जल डालना चाहिए और जिस बायें हाथ से गुदा पर मिट्टी मली है व जल से उसे धोया है, उस पर दस बार जल डालते हुए दोनों हाथों पर सात बार मिट्टी मलकर उन्हें जल से अच्छी प्रकार धोना चाहिए ।

यहाँ यह भी विचारणीय है कि लेखक ने अपनी समीक्षा में केवल ईसा मसीह और ईसाइयों का ही उल्लेख किया है जबकि ख़तना तो यहूदी और मुसलमान भी कराते हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों ने शोध कर दावा किया है कि ख़तना कराने वाले लोगों में एच.आई.वी. संक्रमण होने के आसार अन्य लोगों की तुलना में छः गुना कम होते हैं। एक विज्ञान की पत्रिका में यह भी बताया गया है कि पुरुषों की जनेन्द्रिय की पतली चमड़ी पर एच.आई.वी. संक्रमण ज्यादा कारगर तरीके से हमला करता है। ख़तना कराकर अगर चमड़ी को हटा दिया जाए तो संक्रमण का ख़तरा कम हो जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ख़तने के द्वारा एच.आई.वी. संक्रमण से बचाव हो सकता है, क्योंकि लिंग की बाहरी पतली झिल्ली एच.आई.वी. के लिए आसान शिकार है। ख़तना जनेन्द्रिय की झिल्ली के अन्दर जमा होने वाले पसेव (गंदगी) से तो बचाता ही है साथ ही पुरुष के पुरुषत्व को भी बढ़ाता है। इसका मनुष्य के मन-मस्तिष्क पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। ख़तना के एड्स जैसी अन्य ख़तरनाक बीमारियों से बचाव के दूरगामी लाभ भी हो सकते हैं जो अभी मनुष्य की आंखों से ओझल हैं।
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खतने से घटता है सर्वाइकल कैंसर का खतरा

वाशिंगटन। हर परंपरा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण होता है। मुस्लिमों में बचपन में की जाने वाली खतना की रस्म [जननांग की ऊपरी चमड़ी को निकालना] को कई दुसाध्य बीमारियों से निपटने में बेहद कारगर बताया गया है। हाल में हुए एक शोध के मुताबिक खतना से एड्स व यौन संचारित वायरस के चलते होने वाले सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम में मदद मिलती है।
शोध में नवजात शिशुओं का खतना किए जाने से उन्हें भविष्य में यौन संचारित रोगों से बचाव की बात कही गई है। वर्साय यूनिवर्सिटी [फ्रांस] के डा. बेर्टन आवर्ट और उनके दक्षिण अफ्रीकी सहयोगियों ने अध्ययन के दौरान करीब 1200 पुरुषों का परीक्षण किया। अध्ययन में खतना वाले 15 फीसदी व बिना खतना वाले 22 फीसदी पुरुषों को ह्यूंमन पैपीलोमा वायरस [एचपीवी] से संक्रमित पाया गया। सर्वाइकल कैंसर सहित यौन संचारित रोगों [सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज] के पीछे एचपीवी को जिम्मेदार माना जाता है।
शोधार्थियों ने खतना करा चुके पुरुष के साथ यौन संबंध बनाने वाली महिलाओं को उन महिलाओं की तुलना में सर्वाइकल कैंसर का खतरा कम पाया जिन्होंने खतना नहीं कराने वाले पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाया।
इतना ही नहीं अमेरिका के बाल्टीमोर में अफ्रीकी-अमेरिकियों पर किए गए शोध में खतना कराने वाले 10 फीसदी पुरुषों के मुकाबले खतना नहीं कराने कराने वाले 22 फीसदी पुरुषों को एड्स से संक्रमित पाया गया। प्रमुख शोधकर्ता डा. रोनाल्ड ग्रे के मुताबिक अमेरिका में रहने वाले अफ्रीकी व हिस्पैनिक [लैटिन] पुरुषों में खतना की प्रथा कम पाई जाती है। इस कारण उनमें एड्स का खतरा ज्यादा पाया जाता है। दुनियाभर में हर साल 3.3 करोड़ लोग एड्स से संक्रमित होते हैं। वहीं पूरी दुनिया में प्रति वर्ष तीन लाख महिलाओं की सर्वाइकल कैंसर से मौत हो जाती है।
धन्‍यवाद 
http://in.jagran.yahoo.com/news/international/general/3_5_5081942.html/print/

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female circumcision in islam
औरतों की खतना
कुरआन में खतना का जिकर नहीं, दीने इबराहीम abrahamic religions अर्थात यहूद, इसाई और मुसलमान में आखरी पेगम्‍बर मुहम्‍मद सल्‍ल. ने इस्‍लाम में पिछले धर्मों की जिन अच्‍छी बातों को जारी रखा उनमें एक मर्दों की खतना है,
महिलाओं की खतना का जिकर सही अहादीस में नहीं मिलता, जिन हदीसों को कमजोर हदीस माना गया है उनसे पता चलता है कि उस दौर में जिस व्‍यक्ति को बुरे अंदाज में पुकारना होता था तो कहा जाता था कि ''ओ महिलाओं की खतना करने वाली के बेटे'' अर्थात अच्‍छी बात नहीं समझी जाती थी,  लगभग सभी बडे मुस्लिम इदारों को इसको ना मानने पर इत्‍तफाक है इसी कारण यह केवल इधर उधर छोटी मोटी जगह पर कमजोर हदीसों पर अडे हुए  या उनको इलाकाई रस्‍म व रिवाज पर अडे हुए लोगों जैसे की अफ्रीका आदि की सोच का नतीजा है, इंडिया पाकिस्‍तान बंग्‍लादेश यहां तक की अरब में भी यह बात मुसलमान भी नहीं जानते,  जानने पर हैरत का इजहार करते हैं,  इस लिए कुछ अडे हुए लोंगों की सोच का जिम्‍मेदार पूरी कौम को नहीं माना जा सकता, इधर कोई बुरी प्रथा नहीं जैसे कि सती प्रथा जिसे जबरदस्‍ती छूडवाया गया,

फिर भी जिसको यह बुरी प्रथा लगे वो मुस्लिम संस्‍थाओं की इस बात को फैलाए की इस बात को कमजोर हदीस का माना गया है इस लिए छोड दें

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Wednesday, September 15, 2010

Arya Samaj - कुरआन पर आरोपः कितने स्तरीय ?

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के संस्करण 2006 के पृष्ठ संख्या (ग) पर संपादक की भूमिका में लिखा है कि स्वामी जी ने यद्यपि 14 समुल्लास ही लिखवाए थे, मगर इसके प्रथम संस्करण में प्रकाशक राजा जयकृष्ण दास ने 12 समुल्लास ही प्रकाशित किए। प्रथम संस्करण में अंतिम दो समुल्लास प्रकाशित न करने का कारण स्वामी जी ने यह लिखा है कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रथम प्रकाशक राजा जी ब्रिटिश सरकार में डिप्टी कलेक्टर थे। उन दिनों भारत में ब्रिटिश सरकार का आतंक था। फलतः सरकार के मुलाजिम होने के नाते वे ईसाई सरकार को अप्रसन्न नहीं करना चाहते थे। दूसरा कारण यह लिखा है कि प्रकाशक की मुस्लिम नेताओं से व्यक्तिगत दोस्ती थी। अतः ईसाई मत और कुरआन मत का खंडन छपवाना उस समय उचित न समझा गया।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के द्वितीय संस्करण सन् 1882 में 14 समुल्लास प्रकाशित किए गए। यहाँ सवाल यह पैदा होता है कि सन् 1882 में न तो देश के हालात बदले और न ही हुकूमत बदली, फिर क्यों अंतिम दो समुल्लास जोड़े गए ? दूसरा सवाल यह कि प्रकाशक की व्यक्तिगत मजबूरी के कारण एक ग्रंथ को आधा-अधूरा प्रकाशित करना औचित्यपूर्ण सा नहीं लगता। प्रकाशक बदला जा सकता था। पूरी कौम की नफ़रत और दुश्मनी में 10-20 मुस्लिम दोस्तों की दोस्ती कुरबान की जा सकती थी। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के द्वितीय संस्करण में 13वें और 14वें अध्यायों का प्रकाशन संदेहपूर्ण (Doubtful) है।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ का 14वां समुल्लास कुरआन से संबंधित है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के रचयिता ने इस समुल्लास में बार-बार यह आरोप लगाया है कि यह कुरआन किसी अल्पज्ञ और जंगली व्यक्ति का बनाया हुआ है। खुदा के नाम से मुहम्मद साहब ने अपना मतलब सिद्ध करने के लिए यह क़ुरआन किसी कपटी-छली और महामूर्ख से बनवाया होगा। थोड़ी देर के लिए अगर यह बात मान भी ली जाए कि यह कुरआन किसी जंगली, अल्पज्ञ और महामूर्ख व्यक्ति (खुदा माफ करें) द्वारा बनाई हुई पुस्तक है तो यहाँ एक बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि क्या कोई अल्पज्ञ और जंगली व्यक्ति इतनी शुद्ध भाषा में कोई पुस्तक लिख सकता है ? तथ्यों की बात बाद में करेंगे। इस पुस्तक में व्याकरण आदि की लेशमात्र भी गलती क्यों नहीं है ? आज तक इस पुस्तक में किसी भाषा संशोधन अथवा सुधार की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ी? 1400 वर्षों की लम्बी अवधि में भी किसी अरबी भाषा के विद्वान और विशेषज्ञ ने इस पुस्तक में कोई गलती क्यों नहीं पकड़ी? इस पुस्तक का आज तक कोई प्रूफ संशोधन क्यों नहीं हुआ? कुरआन की भाषा शैली विशुद्ध, अनूठी और अद्भुत है। क्या कोई निरक्षर व्यक्ति इतनी विशुद्ध, प्रवाहपूर्ण और अनूठी भाषा शैली का प्रयोग कर सकता है ? दूसरा सवाल यह है कि मुहम्मद साहब (सल्ल0) अपना ऐसा कौन-सा मतलब सिद्ध करना चाहते थे जिसके लिए आपको जंगली, अल्पज्ञ और छली-कपटी व्यक्तियों का सहयोग लेना पड़ा ? तीसरा सवाल यह है कि क्या कोई छली-कपटी और स्वार्थी व्यक्ति इतने उच्च नैतिक मूल्यों का प्रतिपादन और स्थापन कर सकता है जितने उच्च और उत्तम मूल्य कुरआन में प्रतिपादित किए गए हैं?

उदाहरणार्थ कुछ अंशों को देखिए -
1. ‘‘बेहयाई के करीब तक न जाओ चाहे वह जाहिर हो या पोशीदा।’’ (कुरआन 6-152)
2. ‘‘निर्धनता के भय से अपनी औलाद का क़त्ल न करो।’’ (कुरआन 6-152)
3. ‘‘जब बात कहो, इंसाफ की कहो चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो।’’ (कुरआन 6-153)
4. ‘‘किसी मांगने वाले को मत झिड़को।’’ (कुरआन 93-10)
5. ‘‘बुराई का बदला भलाई से दो।’’ (कुरआन 41-34)
6. ‘‘भलाई में एक दूसरे से बढ़ जाने का प्रयास करो।’’ (कुरआन 3-48)
7. ‘‘माँ-बाप को उफ तक न कहो और न उन्हें झिड़को।’’ (कुरआन 17-23)
8. ‘‘जुआ, ‘शराब, देवस्थान व पांसे गंदे शैतानी काम है इनसे अलग रहो।’’ (कुरआन 5-90)

चोथा सवाल यह है कि क्या कोई विद्याहीन और जंगली व्यक्ति रहस्य पूर्ण ब्रह्मांडीय सिद्धांतों का प्रतिपादन कर सकता है ? कुरआन में वर्णित अनेक भूगोलीय और खगोलीय तथ्य आज विज्ञान की कसौटी पर सत्य साबित होते जा रहे हैं जिन्हें उस वक्त कोई नहीं जानता था। अब क्या उक्त आरोप कि कुरआन किसी अल्पज्ञ और कपटी-छली द्वारा बनाया गया है, तर्कहीन और मूर्खतापूर्ण नहीं है ?

‘सत्यार्थ प्रकाश’ जो एक वेद विद्वान और संस्कृत के प्रकांड पंडित का लिखा हुआ बताया जाता है, इसके अब तक 38 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। कई बार वेद-विद्वानों और विशेषज्ञों की एक टीम द्वारा इसके प्रूफ शौधन का प्रयास किया गया, मगर आज तक इसकी भाषा और व्याकरण ही शुद्ध न हो सकी। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि इस ग्रंथ के संपादको और अनुयायियों ने कभी इसे न गंभीरता से लिया है और न ही कोई खास महत्व ही दिया है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का 38वां संस्करण जो सन् 2006 में प्रकाशित हुआ और जिसका संपादन पंडित भगवद्दत् (रिसर्च स्कॉलर) ने किया। इस संस्करण को साढ़े तीन माह तक विद्वानों की एक टीम द्वारा प्रूफ शोधन के बाद प्रकाशित कराया गया। लिखा गया है कि इस बार सर्वशुद्ध ‘सत्यार्थ प्रकाश’ देने का प्रयास किया जा रहा है, मगर नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ व्याकरण की अशुद्धियाँ आज तक भी ‘शुद्ध नहीं हो पाई। भाषा व्याकरण तो क्या, उसमें वर्णित कुरआन की आयतों के नम्बर व तरतीब तक गलत है।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के रचयिता द्वारा 14वें समुल्लास में जितनी गंदी और घटिया भाषा का प्रयोग किया गया है, समीक्षा में तर्क और तथ्य भी उतने ही घटिया बचकाने और मूर्खता पूर्ण हैं। न कहीं गंभीर विचार है, न कोई युक्ति है और न तर्क। लगता है लेखक यह जानता ही न था कि तर्क क्या होता है ? तथाकथित विद्वान द्वारा कुरआन के तथ्यों के साथ जो खिलवाड़ किया गया है और बेधड़क होकर जिस तरह कीचड़ उछाली गई है, इससे प्रतीत होता है कि कथित लेखक दुराभाव के कारण अपनी अक्ल ही खो बैठा था।

समीक्षा क्रम सं0 43, 99, 112 में कथित लेखक ने लिखा है कि कुरआन का कर्ता न तो खगोल विद्या (Astronomy) जानता था और न ही उसे भूगोल (Geography½ की विद्या आती थी। लेखक ने लिखा है कि क्या सूरज और चाँद सदा घूमते हैं और पृथ्वी नहीं घूमती ? यदि कुरआन का बनाने वाला पृथ्वी का घूमना आदि जानता तो यह बात कभी न कहता कि पहाड़ों के धरने से पृथ्वी नहीं हिलती। इससे विदित होता है कि कुरआन के बनाने वाले को भूगोल-खगोल की विद्या नहीं थी।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के अष्टम समुल्लास में लिखा है कि सविता अर्थात वर्षा आदि का कर्ता अपनी परिधि (Axis) में घूमता है, किन्तु किसी लोक के चारों ओर (Orbit) नहीं घूमता। (प्रश्न क्रम सं0 70)

स्वामी जी ने अपनी उक्त धारणा को सत्य साबित करने के लिए यजुर्वेद का एक मंत्र भी प्रस्तुत किया है।
‘‘आ कृष्णेन रजसा वत्र्तमानो निवेशयमृतं मत्र्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।’’
(क्रम सं0 71)
जबकि कुरआन में लिखा है -
1. ‘‘और सूर्य वह अपने ठिकाने की तरफ चला जा रहा है।’’
“And the Sun runs onto a resting place” (36-38)
2. ‘‘और वही है जिसने रात और दिन और सूरज और चांद बनाए। सब एक-एक मदार में तैर रहे हैं।
“It is who created the night and the day and the sun and the
moon : all (the celestial bodies) swim along, each in its rounded
orbits. (21-23)

कुरआन की उक्त आयतों से स्पष्ट है कि सभी आकाशीय पिंड (All Celestial Bodies) न केवल अपनी धुरी (Axis) पर घूम रहे हैं, बल्कि अपनी-अपनी कक्षा (Orbit) में भी चक्कर लगा रहे हैं। जिस प्रकार हमारी पृथ्वी की अपनी धुरी (Axis) पर औसत गति 1610 कि.मी. प्रति घंटा और अपनी कक्षा (Orbit) में औसत गति 107160 कि.मी. प्रति घंटा है, ठीक इसी प्रकार सूरज और चांद की गतियाँ हैं। हमारा सूर्य अपने परिवार और पड़ोसी तारों के साथ एक गोलाकार कक्षा (Orbit) में लगभग 9 लाख 60 हजार कि.मी. प्रति घंटा की अनुमानित गति से मंदाकिनी के केन्द्र के चारों ओर परिक्रमा कर रहा है, जबकि सूर्य को अपनी धुरी (Axis) पर एक पूर्ण चक्कर लगाने में 25.38 दिन का समय लगता है। इन वैज्ञानिक तथ्यों में अब कोई संदेह नहीं है, क्योंकि अब यह एक आंखों देखी सच्चाई है। हमारी पूरी पृथ्वी बिल्कुल एक जैसी नहीं है। यह कहीं से समतल है तो कहीं इस पर गहरे समुद्र हैं। दूसरी बात यह कि हमारी पृथ्वी अनेक परतों से बनी हुई है। अगर पृथ्वी पर गहरे समुद्र तो होते मगर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ न होते तो पृथ्वी का संतुलन (Balance) कैसे कायम होता ? पृथ्वी अपनी अक्ष (Axis) और कक्षा (Orbit) में संतुलित और सुव्यवस्थित गति से कैसे घूमती ? अगर पहाड़ न होते तो पृथ्वी की परतें कैसे एक दूसरे से बंधी रहती ? इस तरह के तथ्य हमें वेद मंत्रों में भी मिलते हैं। उक्त प्रकार की आयतें विज्ञान विषय से संबंध रखती हैं। बिना शोध, अन्वेषण और जानकारी के उक्त प्रकार की आयतों की समीक्षा लिखना क्या बौद्धिक पागलपन को नहीं दर्शाता ?
जिस विद्वान ने कुरआन पर यह आरोप लगाया है कि कुरआन का कर्ता यह भी नहीं जानता की पृथ्वी घूमती है, उस तथाकथित विद्वान को कुरआन का कितना ज्ञान था ? इसके साथ तथाकथित विद्वान ने यह भी कहा है कि सूर्य किसी लोक के चारों ओर नहीं घूमता। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के कर्ता की यह बात भी झूठी साबित हो गई। अफ़सोस इस बात का है कि आरोपी ने आरोप भी इतनी ढीठता और दंभ के साथ लगाए हैं, मानो वह स्वयं पृथ्वी आदि का बनाने और घुमाने वाला हो।

चैदहवें समुल्लास के रचयिता ने लिखा है कि कुरआन की दृष्टि से सारे हिंदू काफ़िर हैं, क्योंकि वे कुरआन और पैगम्बर को नहीं मानते। कुरआन की शिक्षा और आदेश यह है कि ‘‘काफिरों का कत्ल करो।’’ (समीक्षा क्रम सं0 2) कोई बताए कि कुरआन का अवतरण किस देश में कब और किस प्रकार हुआ ? कुरआन में जब यह हुक्म दिया गया तब कुरआन और पैग़म्बर को मानने वाले कितने लोग थे ? क्या 1000-1500 लोगों को ये हुक्म देना कि सारी दुनिया के लोग काफ़िर हैं, इन्हें जहां पाओ कत्ल करो, औचित्यपूर्ण और मुसलमानों के हित में था ? क्या 1000-1500 आदमी सारी दुनिया के काफ़िरों को कत्ल कर सकते हैं ?

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के लेखक ने मुसलमानों के लिए जंगली, अल्पज्ञ, विद्याहीन, म्लेच्छ, दुष्ट, धोखेबाज़, लड़ाईबाज़, गदर मचाने वाले, अन्यायी, विषयी (Sexual) आदि अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया है। वेद, मनुस्मृति और सत्यार्थ प्रकाश के कर्ता अनार्य (मुसलमान आदि), दुष्ट और वेदनिंदकों के लिए क्या सजा है ? यह वेद विद्वान अवश्य जानते होंगे। अगर नहीं जानते तो आइए देखिए

‘सत्यार्थ प्रकाश’ में कहाँ क्या लिखा है?
1. ‘‘आर्यों से भिन्न मनुष्यों का नाम दस्यु है।’’
(समुल्लास-11, क्रम सं0-1),
2. ‘‘दस्यु दुष्ट मनुष्य को कहते हैं।’’
(स्वमंत व्यामन्तव्यप्रकाशः क्रम सं0 29)।
3. ‘‘दुष्ट मनुष्य को मारने में हन्ता को कोई पाप नहीं लगता।’’ (षष्ठ समु0 मनु0-11)।
जब आर्यों से भिन्न सभी मनुष्य ‘दुष्ट’ हैं और उन्हें मारने में भी कोई पाप नहीं है तो फिर ‘काफिर’ शब्द को लेकर इतना बवाल क्यों ? जिस प्रकार वेद के न मानने वालों को नास्तिक कहा गया है, ठीक उसी प्रकार कुरआन के न मानने वालों को काफ़िर कहा गया है। यह कैसा चरित्र और कैसी नैतिकता है कि हमारी हर बात सही और दूसरों की सही भी गलत ? कुरआन में तो काफ़िर शब्द उन लोगों के लिए आया है कि जो हक़ के दुश्मन थे और साजिशें कर रहे थे। कुरआन की प्रत्येक आयत अपना एक ख़ास संदर्भ रखती है। संदर्भ को समझे बिना हम किसी आयत का अर्थ और भावार्थ नहीं समझ सकते।

समीक्षा क्रम सं0 159 में लिखा है कि ऊँटनी के लेख से यह अनुमान होता है कि अरब देश में ऊँट-ऊँटनी के सिवाय दूसरी सवारी कम होती है। इससे सिद्ध होता है कि किसी अरब देशीय ने कुरआन बनाया है। उक्त बात से पाठक ये अंदाजा बखूबी लगा सकते हैं कि जो आदमी कुरआन की समीक्षा लिखने बैठा है, उसका बौद्धिक स्तर कितना ऊँचा है ? वह यह भी नहीं जानता था कि कुरआन का अवतरण कब, कहाँ और किस प्रकार हुआ? उसने कुरआन में ऊँट शब्द पढ़कर अनुमान लगाया कि कुरआन किसी अरबी व्यक्ति द्वारा बनाया गया है।
समीक्षा क्रम सं0 34 में लिखा है कि सुअर का निषेध, क्या मनुष्य का मांस खाना उचित है ? कितना बचकाना और बेतुका सवाल है ? कुरआन में नशे (शराब) का निषेध किया है। अब कोई यह सवाल करें कि कुरआन में जहर और तेज़ाब पीने का निषेध क्यों नहीं किया गया है ? तो क्या यह सवाल और आरोप मूर्खतापूर्ण नहीं होगा ? इस तरह तो एक पुस्तक खाने-पीने के विधि-निषेधों के लिए ही अपर्याप्त रहेगी। तात्कालिक समाज में जो बड़ी बुराइयाँ होती हैं, एक संदेशवाहक द्वारा उनकी ही निशानदेही की जाती है। आगे लिखा है कि मुर्दार हराम तो मारकर क्यों खाते हैं ? एक वेद विद्वान इतना भी नहीं जानता कि मुर्दार किसे कहते हैं ?

दिन में न खाना, रात को खाना सृष्टि क्रम के विपरीत है ? (समीक्षा क्रम सं0 35)। यह भी कितना बचकाना आरोप है ? कोई बताए कि उक्त तथ्य में कितनी वैज्ञानिक सच्चाई है ? अक्सर लोग दिन छिपने के बाद ही खाना खाते हैं। समीक्षा क्रम सं0 51 में लिखा है ‘‘जिस समय ईसाई और मुसलमानों का मत चला था, उस समय उन देशों में जंगली और विद्याहीन मनुष्य अधिक थे इसलिए ऐसे विद्या विरूद्ध मत चल गए। अब विद्वान अधिक हैं, इसलिए आज ऐसा मत नहीं चल सकता। किन्तु जो-जो ऐसे पोकल मज़हब हैं वे भी अस्त होते जाते हैं। वृद्धि की तो कथा ही क्या है?’’ क्या उक्त आरोप किसी बुद्धिमान और जानकार व्यक्ति का हो सकता है ? क्या वास्तव में ईसाई और मुसलमान मत खत्म होते जा रहे हैं ? कोई बताए विद्वानों का कौन-सा मत है जो आज फैलता जा रहा है ? जैसा कि लिखा है कि अब विद्वान अधिक हैं, कोई बताए कि सन् 1875 में जब लेखक ने उक्त समीक्षा लिखी थी, कितने विद्वान थे ? स्वामी जी ने एक-एक कर सबकी ऐसी बखिया उधेड़ी है कि कोई भी बेदाग न छोड़ा। कोई मत ऐसा नहीं था जिसका लेखक ने खण्डन न किया हो।

समीक्षा क्रम सं0 53 में लिखा है कि अल्लाह ने तीन हजार फरिश्तों से मुसलमानों की मदद की, तो अब मुसलमानों की बादशाही बहुत सी नष्ट हो गई है और होती जाती है, अब अल्लाह क्यों मदद नहीं करता ? वैसे तो कुरआन की उक्त आयत एक खास संदर्भ में कही गई है मगर क्या दुनिया से मुसलमानों की बादशाही नष्ट हो गई है या उस वक्त से ज़्यादा है जब यह समीक्षा लिखी गई थी ? कोई यह भी तो बताए कि आरोप लगाने वालों की बादशाहत दुनिया में कितनी और कहाँ-कहाँ है ? आगे कुछ बाते मैं संक्षेप में लिख रहा हूँ ताकि आलेख बहुत लम्बा न हो जाए।
समीक्षा क्रम सं0 98 ः ‘‘क्या खुदा ऊपर रहता है ?’’ क्या यह भी कोई आरोप है ? आरोपों का स्तर देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपी कोई विकृत मानसिकता का व्यक्ति था। क्या उक्त आरोप का भावार्थ यह नहीं है कि खुदा सबसे बड़ा और ऊपर है। समीक्षा क्रम सं0 99 ः क्या चांद, सूरज सदा फिरते हैं और पृथ्वी नहीं फिरती ? कुरआन में यह कहाँ लिखा है कि पृथ्वी नहीं घूमती ? समीक्षा क्रम सं0 96 ः और जो खुदा मेघ विद्या जानता तो आकाश से पानी उतारा लिखा पुनः यह क्यों लिखा कि पृथ्वी से पानी ऊपर चढ़ाया ? लगता है आरोप लगाने वाला व्यक्ति कोई ज्यादा बड़ा वैज्ञानिक और पदार्थ विद्या का विशेषज्ञ है। कोई बताए इसमें क्या कुछ गलत लिखा है ? वर्षा का एक चक्र है जो घूमता रहता है।
समीक्षा क्रम सं0 104 ः ‘‘प्रत्येक की गर्दन में कर्म पुस्तक। हम तो किसी एक की गर्दन में भी नहीं देखते ?’’ कितना विद्वतापूर्ण आरोप है ? भला आत्मा कहीं दिखाई देती है ? ‘शायद हम कर्मपत्र को मरने के बाद ही समझे।

समीक्षा क्रम सं0 105 ः न्याय तो वेद और मनुस्मृति में देखो जिसमें क्षणमात्र भी विलम्ब नहीं होता और अपने-अपने कर्मानुसार दण्ड व प्रतिष्ठा सदा पाते रहते हैं। कोई बताए वह कौन-सी जगह है जहाँ हर क्षण न्याय हो रहा है? एक व्यक्ति अपनी पूरी जिंदगी लूट खसोट करता है, मगर यहाँ उसका कभी बाल-बांका नहीं होता।

समीक्षा क्रम सं0 142 ः दूध की नहरे कभी हो सकती हैं? क्योंकि वह थोड़े समय में बिगड़ जाता है। भला जिसने इतना विशाल और अद्भुत ब्रह्मांड बनाया, क्या वह ऐसे दूध की नदियां नहीं बहा सकता जो कभी खराब न हो ? यहाँ दूध का मतलब गाय-भैंस का दूध नहीं है, बल्कि दूध जैसा पौष्टिक और स्वादिष्ट कोई पेय पदार्थ है जो पानी जैसा भी हो सकता है।
समीक्षा क्रम सं0 129 में मुहम्मद (सल्ल0) को विषयी (Sexual) और समीक्षा क्रम सं0 152 में कुरआन को समलैंगिकता ¼Homosex½ का मूल बताया है। क्या इतना झूठा और घटिया आरोप लगाकर कथित लेखक ने निकृष्ट मानसिकता का परिचय नहीं दिया है ?
अक्सर अखबार में कुछ इस तरह के ‘शीर्षक लगाए जाते हैं। ‘‘सोने की हो गई चांदी’’, ‘‘चांदी औंधे मुंह गिरी’’। अगर कोई व्यक्ति उक्त शब्दों का बिना भावार्थ समझे यह आरोप लगाने लगे कि सोने की चांदी कैसे हो सकती है ? चांदी के कोई मुंह होता है जो वह मुंह के बल गिर जाएगी ? तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उक्त व्यक्ति में कितनी अक्ल होगी। 14वें समुल्लास के कर्ता की अक्ल उक्त व्यक्ति से ज्यादा नहीं है। संदर्भ को बिना समझे केवल बाह्य ‘शब्दों और अर्थां के आधार पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना और तर्कां का जवाब कुतर्कों से देना कहाँ का पांडित्व और विद्वता है ?

यहाँ यह भी विचारणीय है कि ‘‘कुरआन ईश्वरीय पुस्तक नहीं है।’’ यह साबित करने के लिए 200-400 आरोपों की भला क्या जरूरत है ? इसके लिए तो केवल एक ही आरोप काफी है बशर्ते उसे ठोस सबूतों से साबित किया जाए। इतने ढेर सारे आरोप लगाकर तो कथित व्यक्ति ने अपने आपको निर्बुद्धि, कपटी और सिरफिरा ही साबित किया है। ऐसा व्यक्ति जो किसी पुस्तक की न मूल भाषा जानता हो और न ही उपभाषा और बिना किसी अध्ययन और चिंतन के समीक्षा लिखनी प्रारम्भ कर दे और समीक्षा भी उस भाषा में लिखे, जिस भाषा का उसे समुचित ज्ञान न हो। क्या यह मूर्खता और धूर्तता की पराकाष्ठा नहीं है ?

उक्त बातों से स्पष्ट है कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के 14वें अध्याय की भाषा और तथ्य एक संन्यासी, वेद विद्वान, संस्कृत के प्रकांड पंडित के चरित्र से कोई मेल नहीं रखते। निकृष्ट और दंभ पूर्ण भाषा, मूर्खता पूर्ण और बचकाने तर्कों और तथ्यों का एक बाल ब्रह्मचारी, आचार्य और अध्यात्मवेत्ता के व्यक्तित्व और कृतित्व से भला क्या लेना-देना ? झूठ, कटु आलोचना, निंदा, गाली-गलौच, अमर्यादित और अहंकार पूर्ण भाषा, क्रोध, नफरत, पूर्वाग्रह आदि सब मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म के 10 लक्षणों और एक ब्रह्मचारी के चरित्र और आचरण के बिल्कुल विपरीत है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के 14वें अध्याय को एक ब्रह्मचारी और वैदिक विद्वान से जोड़ना हिमाकत और धृष्टता है। रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी विवेकानन्द (1683-1902) को भी कुरआन के तथ्यों पर आपत्ति थी, मगर उन्होंने तो कभी कुरआन और पैग़म्बर के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं किया।

दाह संस्कारः कितना उचित?

 ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी दयानंद सरस्वती ने एक प्रश्न की समीक्षा में लिखा है कि मुर्दे को गाड़ने से संसार की बड़ी हानि होती है, क्योंकि वह सड़कर वायु को दुर्गन्धमय कर रोग फैला देता है। स्वामी जी आगे लिखते हैं कि मुर्दों को गाड़ने से अधिक भूमि खराब होती है। कब्रों को देखने से भय भी होता है, इसलिए गाड़ना आदि सर्वथा निषिद्ध है। लिखा है कि मुर्दों को सबसे बुरा गाड़ना है, उससे कुछ थोड़ा बुरा जल में डालना है, उससे कुछ एक थोड़ा बुरा जंगल में छोड़ना है और जो जलाना है वह सर्वोत्तम है, क्योंकि उसके सब पदार्थ अणु होकर वायु में उड़ जाते हैं। किसी ने स्वामी जी से कहा कि जिससे प्रीति हो उसको जलाना अच्छी बात नहीं है। गाड़ना तो ऐसा है जैसा उसको सुला देना है। इसलिए गाड़ना अच्छा है। स्वामी जी कहते हैं कि जो मृतक से प्रीति करते हो तो अपने घर में क्यों नहीं रखते ? और गाड़ते भी क्यों हो ? जिस जीवात्मा से प्रीति थी वह तो निकल गया, अब दुर्गन्धमय मिट्टी से क्या प्रीति? जो प्रीति करते हों तो उसको पृथ्वी में क्यों गाड़ते हो, क्योंकि किसी से कोई कहे कि तुझको भूमि में गाड़ देवे तो वह सुनकर प्रसन्न कभी नहीं होता। (13-40, 41, 42)

एक सामान्य व्यवहार की बात है कि अगर बस्ती के पास कोई बदबूदार गंदगी या कोई जानवर जैसे चूहा, बिल्ली, कुत्ता आदि मरा पड़ा हो तो बदबू से बचने के लिए बस्ती के लोग उसे मिट्टी में दबा देते हैं ताकि बदबू फैलकर मनुष्यों को प्रभावित न करें। मनुष्य की अंतरात्मा कभी यह गवारा न करेगी कि किसी मृत जानवर को जलाया जाए। अगर कोई व्यक्ति किसी मृत जानवर को जलाएगा तो उसे अवश्य घिन आएगी। दूसरी यह बात भी सामान्य सी है कि जब किसी वस्तु आदि को जलाया जाता है तो उससे अवश्य वायु प्रदूषित होती है। मृत मनुष्यों को जलाना तो वस्तु आदि के जलाने से कहीं अधिक हानिकारक और ख़तरनाक है क्योंकि मृत मनुष्य को जलाने से न केवल वायु प्रदूषित होती है बल्कि रोगजनित गैसे भी निकलती हैं, जिनका प्रभाव मानव जीवन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अवश्य पड़ता है। तीसरा एक मानवीय पहलू यह भी है कि जिस व्यक्ति के साथ हमने जीवन गुजारा है, जो हमारी आदरणीय माँ, बाप, प्रिय पत्नी, पुत्र व पुत्री आदि है, मरने के बाद उसे अपनी आँखों के सामने, अपने ही हाथों से आग में रखना व उसकी हड्डियों तक को भस्मीभूत कर देना कहाँ की मानवता है ?

क्या यह क्रिया दिल दहला देने वाली नहीं है ? इस विषय से जुड़ा एक अनैतिक व अमानवीय पहलू यह भी देखने में आता है कि जब किसी लाश को जलाया जाता है तो कफ़न पहले जलता है और लाश नंगी हो जाती है। यह वाकिया मानवता को ‘शर्मसार करने वाला होता है। लाश अगर माँ अथवा औरत की हो तो इससे अधिक निर्लज्जता की बात क्या कोई और हो सकती है?

स्वामी दयानंद सरस्वती ने दाह संस्कार की जो विधि बताई है वह विधि दफ़नाने की अपेक्षा कहीं अधिक महंगी है। जैसा कि स्वामी जी ने लिखा है कि मुर्दे के दाह संस्कार में ‘शरीर के वज़न के बराबर घी, उसमें एक सेर में रत्ती भर कस्तूरी, माशा भर केसर, कम से कम आधा मन चन्दन, अगर, तगर, कपूर आदि और पलाश आदि की लकड़ी प्रयोग करनी चाहिए। मृत दरिद्र भी हो तो भी बीस सेर से कम घी चिता में न डाले। (13-40,41,42)

स्वामी दयानंद सरस्वती के दाह संस्कार में जो सामग्री उपयोग में लाई गई वह इस प्रकार थी - घी 4 मन यानी 149 कि.ग्रा., चंदन 2 मन यानि 75 कि.ग्रा., कपूर 5 सेर यानी 4.67 कि.ग्रा., केसर 1 सेर यानि 933 ग्राम, कस्तूरी 2 तोला यानि 23.32 ग्राम, लकड़ी 10 मन यानि 373 कि.ग्रा. आदि। (आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पुस्तक, ‘‘महर्षि दयानंद का जीवन चरित्र’’ से) उक्त सामग्री से सिद्ध होता है कि दाह संस्कार की क्रिया कितनी महंगी है। गरीब परिवार का कोई व्यक्ति इस क्रिया को निर्धारित सामग्री के साथ नहीं कर सकता। आज के भौतिकवादी दौर में उपरोक्त किसी भी सामग्री का ‘शुद्ध और स्वच्छ मिलना भी न केवल मुश्किल बल्कि असम्भव है। अतः दाह संस्कार की विधि निर्धारित नियमों व मानकों के आधार पर करना अव्यावहारिक है। दाह संस्कार में मुर्दे के वजन के बराबर घी का सिद्धांत यानी किसी व्यक्ति के दाह संस्कार में 9-10 कनस्तर घी का इस्तेमाल क्या बेतुका-सा नहीं लगता?

यहाँ एक बात यह भी विचारणीय है कि हिंदू समाज में बच्चों, साधु-संन्यासियों को और कुछ वर्गों में आम व्यक्तियों को दफ़न किया जाता है। जब जलाना सर्वोत्तम है तो फिर सर्वोत्तम विधि से बच्चों और साधु-संतों का अंतिम संस्कार क्यों नहीं किया जाता? एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि आर्य अपने मुर्दों को दफ़न करते थे, जलाते न थे। माह सितम्बर 2005 में, मेरठ के सिनौली स्थान पर 5 प्राचीनकालीन ‘शवधियाँ मिली थी, जिनमें मानव कंकाल सुरक्षित हालत में प्राप्त हुए थे। सभी ‘शवधियाँ एक विशिष्ट दिक्स्थापन (सिर उत्तर दिशा में और पैर दक्षिण दिशा में) पैर सीधे और मुंह को बांयी बगल की ओर करके लिटाई गई थी। यह एक सबूत इस बात का है कि प्राचीन लोग भारत में अपने मुर्दों को दफ़न करते थे।

हिंदू धर्म-दर्शन की यह धारणा कि मनुष्य का ‘शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है, मृत्युपरांत पंच तत्वों में विलीन किया जाना चाहिए। अगर इस धारणा को सही माना जाए तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मृत्युपरांत दाह संस्कार की विधि मानव ‘शरीर को पंच तत्वों में विलीन करने की उचित विधि नहीं है। पंच तत्वों में विलीन करने की उचित विधि केवल दफ़नाना ही है।

अग्नि द्वारा किए जाने वाले अंतिम संस्कार में अनेक रुढ़ियाँ व अनावश्यक अनुष्ठान होने के कारण यह क्रिया अत्यंत जटिल और लम्बी है। ये अनुष्ठान भी सार्वभौमिक नहीं है। अपने-अपने क्षेत्रीय, वर्गीय और जातीय रीति-रिवाज के अनुसार लोग अपने मुर्दों का दाह संस्कार करते हैं। अब तो हिंदू समाज में दाह संस्कार की नई-नई तकनीक आ गई हैं। रुपयों-पैसों की भाग-दौड़ में रिश्ते-नातों का महत्व कम हो गया है। लगता है हमारी मानवीय संवदेना मर सी गई है। अब घी, चंदन और केसर की जगह एल.पी.जी. (घरेलू गैस) और उच्च वोल्टेज की विद्युत ‘शक्ति का प्रयोग होने लगा है। इन आधुनिक ‘शवदाह गृहों में चंद मिनटों में काम तमाम। न घी, न चंदन, न कोई झंझट। क्या आधुनिक ‘शवदाह गृह इस बात का खुला प्रमाण नहीं है कि हमने अपनी सुविधानुसार अपने संस्कारों और जीवन मूल्यों को बदला है।

मुर्दे को दफ़न करना एक सार्वभौमिक सत्य है। यह क्रिया सस्ती भी है, आसान भी है और उत्तम भी। साथ-साथ मानवीय मूल्यों के अनुकूल भी है। कब्र को मुर्दे के वहाँ पहुंचने से पहले तैयार कर लिया जाता है। मृत को कब्र में ऐसे लिटा दिया जाता है मानो सुलाकर कमरा बंद कर दिया हो। अब मृत के साथ जो हो रहा है वह कम से कम हमारी आंखों के सामने और स्वयं हमारे द्वारा तो नहीं किया जा रहा है। दफ़नाने में मानवीय मूल्यों का पूरा-पूरा लिहाज़ रखा जाता है। अब रही बात प्रदूषण की तो उचित रूप से दफ़नाए जाने पर वायु प्रदूषण ‘शून्य प्रतिशत होगा। आज विज्ञान का युग है। ‘शोध द्वारा भी हम यह जान सकते हैं कि जलाने और दफ़नाने में कौन-सी विधि प्रदूषण रहित, उत्तम, सस्ती और आसान है। स्वामी जी का यह तर्क कि मुर्दों को दफ़नाने में भूमि अधिक खराब होती है, कोई बौद्धिक और व्यावहारिक तर्क नहीं है। विश्व में ईसाई, यहूदी, मुसलमान, कम्युनिस्ट यानी करीब 85 प्रतिशत लोग अपने मुर्दों को दफ़न करते हैं। पृथ्वी इतनी विशाल है कि मानव जाति कभी उसका पूर्ण प्रयोग न कर सकेगी। दफ़नाने की विधि आज भी ज्यों की ज्यों है जबकि जलाने की विधि बदलती जा रही है।

मृत व्यक्ति को जलाना इसलिए भी उचित नहीं है, क्योंकि अगर किसी व्यक्ति की जानबूझकर किसी “शडयंत्र के तहत हत्या की गई है तो न्यायिक प्रक्रिया में हत्या के साधनों और कारणों को जानना अति आवश्यक है। हत्या के बाद मृत को तुरन्त जलाकर हत्या संबंधी सबूत छिप जाते हैं और अपराधी पर हत्या का केस कमजोर पड़ जाता है। आए दिन सुनने और पढ़ने में आता है कि बहू अथवा किसी अन्य को जलाकर, जहर देकर अथवा गला घोंटकर मार दिया जाता है और लाश को जलाकर अतिशीघ्र ठिकाने लगा दिया जाता है ताकि हत्या के साधनों को छिपाकर कानून से बचा जा सके। इससे न्यायिक प्रक्रिया भी प्रभावित होती है और मृत के संबंधियों को न्याय मिलने की सम्भावना भी कम रह जाती है। दफ़न करने की स्थिति में हत्या संबंधी जांच कई दिन बाद तक की जा सकती है।

स्वामी जी ने अपनी समीक्षा में जिस तथ्य पर अधिक ज़ोर दिया है वह यह है कि मुर्दे को गाड़ने से वायु प्रदूषित होती है, जलाने से वायु प्रदूषित नहीं होती। यह कितना अजीब और बचकाना तर्क है? कोई बताए कि वह कौन-सा विज्ञान है जो कहता है कि जलाने से वायू प्रदूषित नहीं होती ? मुर्दे को जलाने में जो कनस्तरों घी, केसर, कस्तूरी, चंदन आदि सामग्री के इस्तेमाल का उपदेश और आदेश स्वामी जी ने दिया है, क्या यह इसलिए नहीं है कि उक्त सामग्री के साथ जलने से मुर्दे की दुर्गन्ध हमें महसूस न हो? वरना इतनी कीमती सामग्री के साथ मुर्दे को जलाने का आखिर औचित्य क्या है ? स्वामी जी का दूसरा तथ्य यह है कि मुर्दे को जलाने से उसके सब पदार्थ अणु बनकर वायु में उड़ जाते हैं। कोई बताए कि मुर्दे के अणु आसमान में उड़कर कहाँ चले जाते हैं ?

स्वामी जी ने अपनी समीक्षा में जो तीसरा तथ्य प्रस्तुत किया है वह यह है कि किसी से कोई कहे कि तुझको भूमि में गाड़ देवें तो यह सुनकर वह प्रसन्न कभी नहीं होता। (यहाँ यह स्पष्ट नहीं है कि उक्त बात मृत से कही जा रही है या जीवित से)। उक्त बात कितनी बेतुकी और हास्यास्पद है ? क्या कोई यह कहने से खुश होता है कि आ तुझे जला दें ? स्वामी जी का चैथा तथ्य यह है कि मुर्दे के मुंह, आंख और ‘शरीर पर धूल, पत्थर, ईंट, चूना डालना, छाती पर पत्थर रखना कौन-सा प्रीति का काम है ? कोई बताए कि मुर्दे की छाती पर कौन ईंट पत्थर रखता है ? क्या स्वामी जी इतना भी नहीं जानते थे कि मृत व्यक्ति को दफ़न किस प्रकार किया जाता है। छाती पर लक्कड़ तो मृत व्यक्ति को जलाने में रखे जाते हैं न कि दफ़न करने में। किसी वेद विद्वान द्वारा क्या खूब बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल किया गया है। स्वामी जी द्वारा पांचवी बात जो कही गई है वह यह कि मुर्दे को गाड़ने से बेहतर जंगल में छोड़ देना है। क्या यह बावलेपन की बात नहीं है? क्या उक्त बातों से यह सिद्ध नहीं होता कि हमें बस सच्चाई की जिद है। हमें हर हाल में सच्चाई का विरोध ही करना है, नतीजा कुछ भी हो। स्वामी जी ने छठी बात जो कही गई है कि कब्रों को देखने से भय भी होता है। कोई बताए कि मुर्दा किसी का क्या बिगाड़ सकता है ?
ऐसा प्रतीत होता है कि किसी संदेशवाहक की पारलौकिक धारणा की जिद और विरोध में किसी समुदाय विशेष द्वारा जलाने के तरीके को अपनाया गया होगा। बाद में यह तरीका उस समुदाय की मान्यता और परंपरा बन गई होगी। दाह संस्कार धर्म विरूद्ध, विज्ञान विरूद्ध और मानवीय मूल्यों के खि़लाफ़ है। अंत में मैं एक सवाल भी वेद विद्वानों से करूंगा कि कृपया वे बताए कि ‘मनुस्मृति’ के रचयिता महर्षि मनु की लाश को उनके अनुयायियों द्वारा जलाया गया था या दफ़न किया गया था?
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दूसरी तरफ कबर देखें,,,नीचे दिए गए गढे में मुरदा कफन अर्थात कपडे में नहला धुलाकर सम्‍मान से लिटा देते हैं फिर लकडी के तखते से नीचे वाला गढा तखतों की छत से बंद कर दिया जाता उसके उपर मिटटी डाली जाती है, 

Sunday, September 12, 2010

नियोग और नारी

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के चतुर्थ समुल्लास के क्रम सं0 120 से 149 तक की सामग्री पुनर्विवाह और नियोग विषय से संबंधित है। लिखा है कि

द्विजों यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में पुनर्विवाह कभी नहीं होने चाहिए। (4-121)
स्वामी जी ने पुनर्विवाह के कुछ दोष भी गिनाए हैं जैसे -
(1) पुनर्विवाह की अनुमति से जब चाहे पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष छोड़कर दूसरा विवाह कर सकते हैं।
(2) पत्नी की मृत्यु की स्थिति में अगर पुरुष दूसरा विवाह करता है तो पूर्व पत्नी के सामान आदि को लेकर और यदि पति की मृत्यु की स्थिति में स्त्री दूसरा विवाह करती है तो पूर्व पति के सामान आदि को लेकर कुटुम्ब वालों में झगड़ा होगा।
(3) यदि स्त्री और पुरुष दूसरा विवाह करते हैं तो उनका पतिव्रत और स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाएगा।
(4) विधवा स्त्री के साथ कोई कुंवारा पुरुष और विधुर पुरुष के साथ कोई कुंवारी कन्या विवाह न करेगी। अगर कोई ऐसा करता है तो यह अन्याय और अधर्म होगा। ऐसी स्थिति में पुरुष और स्त्री को नियोग की आवश्यकता होगी और यही धर्म है। (4-134)

किसी ने स्वामी जी से सवाल किया कि अगर स्त्री अथवा पुरुष में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है और उनके कोई संतान भी नहीं है तब अगर पुनर्विवाह न हो तो उनका कुल नष्ट हो जाएगा। पुनर्विवाह न होने की स्थिति में व्यभिचार और गर्भपात आदि बहुत से दुष्ट कर्म होंगे। इसलिए पुनर्विवाह होना अच्छा है। (4-122)
जवाब दिया गया कि ऐसी स्थिति में स्त्री और पुरुष ब्रह्मचर्य में स्थित रहे और वंश परंपरा के लिए स्वजाति का लड़का गोद ले लें। इससे कुल भी चलेगा और व्यभिचार भी न होगा और अगर ब्रह्मचारी न रह सके तो नियोग से संतानोत्पत्ति कर ले। पुनर्विवाह कभी न करें। आइए अब देखते हैं कि ‘नियोग’ क्या है ?

अगर किसी पुरुष की स्त्री मर गई है और उसके कोई संतान नहीं है तो वह पुरुष किसी नियुक्त विधवा स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर संतान उत्पन्न कर सकता है। गर्भ स्थिति के निश्चय हो जाने पर नियुक्त स्त्री और पुरुष के संबंध खत्म हो जाएंगे और नियुक्ता स्त्री दो-तीन वर्ष तक लड़के का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देगी। ऐसे एक विधवा स्त्री दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य पुरुषों के लिए अर्थात कुल 10 पुत्र उत्पन्न कर सकती है। (यहाँ यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि कन्या उत्पन्न होती है तो नियोग की क्या ‘शर्ते रहेगी ?) इसी प्रकार एक विधुर दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य विधवाओं के लिए पुत्र उत्पन्न कर सकता है। ऐसे मिलकर 10-10 संतानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है।
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)
भावार्थ ः ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’ (4-125)

वेद की आज्ञा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णस्थ स्त्री और पुरुष दस से अधिक संतान उत्पन्न न करें, क्योंकि अधिक करने से संतान निर्बल, निर्बुद्धि और अल्पायु होती है। जैसा कि उक्त मंत्र से स्पष्ट है कि नियोग की व्यवस्था केवल विधवा और विधुर स्त्री और पुरुषों के लिए नहीं है बल्कि पति के जीते जी पत्नी और पत्नी के जीते जी पुरुष इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। (4-143)

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृराावन्नजामि।
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत्।
(ऋग्वेद 10-10-10)
भावार्थ ः ‘‘नपुंसक पति कहता है कि हे देवि! तू मुझ से संतानोत्पत्ति की आशा मत कर। हे सौभाग्यशालिनी! तू किसी वीर्यवान पुरुष के बाहु का सहारा ले। तू मुझ को छोड़कर अन्य पति की इच्छा कर।’’
इसी प्रकार संतानोत्पत्ति में असमर्थ स्त्री भी अपने पति महाशय को आज्ञा दे कि हे स्वामी! आप संतानोत्पत्ति की इच्छा मुझ से छोड़कर किसी दूसरी विधवा स्त्री से नियोग करके संतानोत्पत्ति कीजिए।

अगर किसी स्त्री का पति व्यापार आदि के लिए परदेश गया हो तो तीन वर्ष, विद्या के लिए गया हो तो छह वर्ष और अगर धर्म के लिए गया हो तो आठ वर्ष इंतजार कर वह स्त्री भी नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकती है। ऐसे ही कुछ नियम पुरुषों के लिए हैं कि अगर संतान न हो तो आठवें, संतान होकर मर जाए तो दसवें और कन्या ही हो तो ग्यारहवें वर्ष अन्य स्त्री से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकता है। पुरुष अप्रिय बोलने वाली पत्नी को छोड़कर दूसरी स्त्री से नियोग का लाभ ले सकता है। ऐसा ही नियम स्त्री के लिए है। (4-145)

प्रश्न सं0 149 में लिखा है कि अगर स्त्री गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए और पुरुष दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो ऐसी स्थिति में दोनों किसी से नियोग कर पुत्रोत्पत्ति कर ले, परन्तु वेश्यागमन अथवा व्यभिचार कभी न करें। (4-149)
लिखा है कि नियोग अपने वर्ण में अथवा उत्तम वर्ण और जाति में होना चाहिए। एक स्त्री 10 पुरुषों तक और एक पुरुष 10 स्त्रियों तक से नियोग कर सकता है। अगर कोई स्त्री अथवा पुरुष 10वें गर्भ से अधिक समागम करे तो कामी और निंदित होते हैं। (4-142) विवाहित पुरुष कुंवारी कन्या से और विवाहित स्त्री कुंवारे पुरुष से नियोग नहीं कर सकती।
पुनर्विवाह और नियोग से संबंधित कुछ नियम, कानून, ‘शर्ते और सिद्धांत आपने पढ़े जिनका प्रतिपादन स्वामी दयानंद ने किया है और जिनको कथित लेखक ने वेद, मनुस्मृति आदि ग्रंथों से सत्य, प्रमाणित और न्यायोचित भी साबित किया है। व्यावहारिक पुष्टि हेतु कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी कथित लेखक ने प्रस्तुत किए हैं और साथ-साथ नियोग की खूबियां भी बयान की हैं। इस कुप्रथा को धर्मानुकूल और न्यायोचित साबित करने के लिए लेखक ने बौद्धिकता और तार्किकता का भी सहारा लिया है। कथित सुधारक ने आज के वातावरण में भी पुनर्विवाह को दोषपूर्ण और नियोग को तर्कसंगत और उचित ठहराया है। आइए उक्त धारणा का तथ्यपरक विश्लेषण करते हैं।
ऊपर (4-134) में पुनर्विवाह के जो दोष स्वामी दयानंद ने गिनवाए हैं वे सभी हास्यास्पद, बचकाने और मूर्खतापूर्ण हैं। विद्वान लेखक ने जैसा लिखा है कि दूसरा विवाह करने से स्त्री का पतिव्रत धर्म और पुरुष का स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाता है परन्तु नियोग करने से दोनों का उक्त धर्म ‘ाुद्ध और सुरक्षित रहता है। क्या यह तर्क मूर्खतापूर्ण नहीं है ? आख़िर वह कैसा पतिव्रत धर्म है जो पुनर्विवाह करने से तो नष्ट और भ्रष्ट हो जाएगा और 10 गैर पुरुषों से यौन संबंध बनाने से सुरक्षित और निर्दोष रहेगा ?

अगर किसी पुरुष की पत्नी जीवित है और किसी कारण पुरुष संतान उत्पन्न करने में असमर्थ है तो इसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि उस पुरुष में काम इच्छा ;ैमगनंस कमेपतम) नहीं है। अगर पुरुष के अन्दर काम इच्छा तो है मगर संतान उत्पन्न नहीं हो रही है और उसकी पत्नी संतान के लिए किसी अन्य पुरुष से नियोग करती है तो ऐसी स्थिति में पुरुष अपनी काम तृप्ति कहाँ और कैसे करेगा ? यहाँ यह भी विचारणीय है कि नियोग प्रथा में हर जगह पुत्रोत्पत्ति की बात कही गई है, जबकि जीव विज्ञान के अनुसार 50 प्रतिशत संभावना कन्या जन्म की होती है। कन्या उत्पन्न होने की स्थिति में नियोग के क्या नियम, कानून और ‘शर्ते होंगी, यह स्पष्ट नहीं किया गया है ?

जैसा कि स्वामी जी ने कहा है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो भी पुरुष नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न कर सकता है। यहाँ यह तथ्य विचारणीय है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो इसके लिए स्त्री नहीं, पुरुष जिम्मेदार है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव जाति में लिंग का निर्धारण नर द्वारा होता है न कि मादा द्वारा।
यह भी एक तथ्य है कि पुनर्विवाह के दोष और हानियाँ तथा नियोग के गुण और लाभ का उल्लेख केवल द्विज वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए किया गया है। चैथे वर्ण ‘शूद्र को छोड़ दिया गया है। क्या ‘शुद्रों के लिए नियोग की अनुमति नहीं है ? क्या ‘शूद्रों के लिए नियोग की व्यवस्था दोषपूर्ण और पाप है ?
जैसा कि लिखा है कि अगर पत्नी अथवा पति अप्रिय बोले तो भी वे नियोग कर सकते हैं। अगर किसी पुरुष की पत्नी गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए अथवा पति दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो दोनों कहीं उचित साथी देखकर नियोग कर सकते हैं। क्या यहाँ सारे नियमों और नैतिक मान्यताओं को लॉकअप में बन्द नहीं कर दिया गया है ? क्या नियोग का मतलब स्वच्छंद यौन संबंधों ;ैमग थ्तमम) से नहीं है ? क्या इससे निम्न और घटिया किसी समाज की कल्पना की जा सकती है?

कथित विद्वान लेखक ने नियोग प्रथा की सत्यता, प्रमाणिकता और व्यावहारिकता की पुष्टि के लिए महाभारत कालीन सभ्यता के दो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। लिखा है कि व्यास जी ने चित्रांगद और विचित्र वीर्य के मर जाने के बाद उनकी स्त्रियों से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की। अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और एक दासी से विदुर की उत्पत्ति नियोग प्रक्रिया द्वारा हुई। दूसरा उदाहरण पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री का है। पाण्डु के असमर्थ होने के कारण दोनों स्त्रियों ने नियोग विधि से संतान उत्पन्न की। इतिहास भी इस बात का प्रमाण है।
जहाँ तक उक्त ऐतिहासिक तथ्यों की बात है महाभारत कालीन सभ्यता में नियोग की तो क्या बात कुंवारी कन्या से संतान उत्पन्न करना भी मान्य और सम्मानीय था। वेद व्यास और भीष्म पितामह दोनों विद्वान महापुरुषों की उत्पत्ति इस बात का ठोस सबूत है। दूसरी बात महाभारत कालीन समाज में एक स्त्री पांच सगे भाईयों की धर्मपत्नी हो सकती थी। पांडव पत्नी द्रौपदी इस बात का ठोस सबूत है। तीसरी बात महाभारत कालीन समाज में तो बिना स्त्री संसर्ग के केवल पुरुष ही बच्चें पैदा करने में समर्थ होता था।

महाभारत का मुख्य पात्र गुरु द्रोणाचार्य की उत्पत्ति उक्त बात का सबूत है। चैथी बात महाभारतकाल में तो चमत्कारिक तरीके से भी बच्चें पैदा होते थे। पांचाली द्रौपदी की उत्पत्ति इस बात का जीता-जागता सबूत है। अतः उक्त समाज में नियोग की क्या आवश्यकता थी ? यहाँ यह भी विचारणीय है कि व्यास जी ने किस नियमों के अंतर्गत नियोग किया ? दूसरी बात नियोग किया तो एक ही समय में तीन स्त्रियों से क्यों किया? तीसरी बात यह कि एक मुनि ने निम्न वर्ण की दासी के साथ क्यों समागम किया ? चैथी बात यह कि कुंती ने नियम के विपरीत नियोग विधि से चार पुत्रों को जन्म क्यों दिया ? विदित रहे कि कुंती ने कर्ण, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन चार पुत्रों को जन्म दिया और ये सभी पाण्डु कहलाए। पांचवी बात यह कि जब उस समाज में नियोग प्रथा निर्दोष और मान्य थी तो फिर कुंती ने लोक लाज के डर से कर्ण को नदी में क्यों बहा दिया ? छठी बात यह है कि वे पुरुष कौन थे जिन्होंने कुंती से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की ? स्वामी जी ने बहुविवाह का निषेध किया है जबकि उक्त सभ्यता में बहुविवाह होते थे। अब क्या जिस समाज से स्वामी जी ने नियोग के प्रमाण दिए हैं, उस समाज को एक उच्च और आदर्श वैदिक समाज माना जाए ?
‘सत्यार्थ प्रकाश’ के ‘शंका-समाधान परिशिष्ट में पं0 ज्वालाप्रसाद ‘ार्मा द्वारा नियोग प्रथा के समर्थन में अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। लिखा है कि प्राचीन वैदिक काल में कुलनाश के भय से ऋषि-मुनि, विद्वान, महापुरुषों से नियोग द्वारा वीर्य ग्रहण कर उच्च कुल की स्त्रियां संतान उत्पन्न करती थी। जो प्रमाण पंडित जी ने प्रस्तुत किए हैं वे सभी महाभारत काल के हैं। क्या महाभारत काल ही प्राचीन वैदिक काल था ? क्या नियोग ही ऋषियों का एक मात्र प्रयोजन था?
यहाँ यह तथ्य भी विचारणीय है कि अगर स्वामी दयानंद सरस्वती नियोग को एक वेद प्रतिपादित और स्थापित व्यवस्था मानते थे तो उन्होंने इस परंपरा का खुद पालन करके अपने अनुयायियों के लिए आदर्श प्रस्तुत क्यों नहीं किया ? इससे स्वामी जी के चरित्र को भी बल मिलता और एक मृत प्रायः हो चुकी वैदिक परंपरा पुनः जीवित हो जाती। यह भी एक अजीब विडंबना है कि जिस वैदिक मंत्र से स्वामी जी ने नियोग परंपरा को प्रतिपादित किया है उसी मंत्र से अन्य वेद विद्वानों और भाष्यकारों ने विधवा पुनर्विवाह का प्रतिपादन किया है। निम्न मंत्र देखिए -
‘‘कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषतुः।
को वां ‘ात्रुया विधवेव देवरं मंर्य न योषा कृणुते सधस्य आ।।
(ऋग्वेद, 10-40-2)
‘‘उदीष्र्व नार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुप ‘ोष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिशोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ।।’’
(ऋग्वेद, 10-18-8)
उक्त दोनों मंत्रों से जहाँ स्वामी दयानंद सरस्वती ने नियोग प्रथा का भावार्थ निकाला है वहीं ओमप्रकाश पाण्डेय ने इन्हीं मंत्रों का उल्लेख विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में किया है। अपनी पुस्तक ‘‘वैदिक साहित्य और संस्कृति का स्वरूप’’ में उन्होंने लिखा है कि वेदकालीन समाज में विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह की अनुमति प्राप्त थी। उक्त मंत्र (10-18-8) का भावार्थ उन्होंने निम्न प्रकार किया है -
‘‘हे नारी ! इस मृत पति को छोड़कर पुनः जीवितों के समूह में पदार्पण करो। तुमसे विवाह के लिए इच्छुक जो तुम्हारा दूसरा भावी पति है, उसे स्वीकार करो।’’
इसी मंत्र का भावार्थ वैद्यनाथ ‘शास्त्री द्वारा निम्न प्रकार किया गया है -
‘‘जब कोई स्त्री जो संतान आदि करने में समर्थ है, विधवा हो जाती है तब वह नियुक्त पति के साथ संतान उत्पत्ति के लिए नियोग कर सकती है।’’
उक्त मंत्रों में स्वामी दयानंद ने देवर ‘शब्द का अर्थ जहाँ ‘द्वितीय नियुक्त पति’ लिया है वहीं पाण्डेय जी ने देवर ‘शब्द का अर्थ ‘द्वितीय विवाहित पति’ लिया है। निरुक्त के संदर्भ में पाण्डेय जी ने लिखा है कि यास्क ने अपने निरूक्त में देवर ‘शब्द का निर्वचन ‘द्वितीय वर’ के रूप में ही किया है। उक्त मंत्रों के साथ पाण्डेय जी ने अथर्ववेद का भी एक मंत्र विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में प्रस्तुत किया है। जो निम्न है -
‘‘या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते परम्।
पत्र्चैदनं च तावजं ददातो न वि योषतः।।
समानलोको भवति पुनर्भुवापरः पतिः।
योऽजं पत्र्चैदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति।।’’
(अथर्वसंहिता 9-5-27,28)
उक्त से स्पष्ट है कि वेद भाष्यों में इतना अधिक अर्थ भेद और मतभेद पाया जाता है कि सत्य और विश्वसनीय धारणाओं का निर्णय करना अत्यंत मुश्किल काम है? यहाँ यह भी विचारणीय है कि विवाह का उद्देश्य केवल संतानोत्पत्ति करना ही नहीं होता बल्कि स्वच्छंद यौन संबंध को रोकना और भावों को संयमित करना भी है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि जो विषय (नारी और सेक्स) एक बाल ब्रह्मचारी के लिए कतई निषिद्ध था, स्वामी जी ने उसे भी अपनी चर्चा और लेखनी का विषय बनाया है।
बेहद अफसोस और दुःख का विषय है कि जहाँ एक विद्वान और समाज सुधारक को पुनर्विवाह और विधवा विवाह का समर्थन करना चाहिए था, वहाँ कथित समाज सुधारक द्वारा नियोग प्रथा की वकालत की गई है और इसे वर्तमान काल के लिए भी उपयुक्त बताया है। क्या यह एक विद्वान की घटिया मनोवृत्ति का प्रतीक नहीं है ? आज की फिल्में जो कतई निम्न स्तर का प्रदर्शन करती हैं, उनमें भी कहीं इस प्रथा का प्रदर्शन और समर्थन देखने को नहीं मिलता। स्वामी दयानंद को छोड़कर नवजागरण के सभी विद्वानों और सुधारकों द्वारा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया गया है।
जब किसी कौम या समाज के धार्मिक लोग जघन्य नैतिक बुराइयों और बिगाड़ में गर्क हो जाते हैं, तो वह कौम नैतिक पतन की पराकाष्ठा को पहुंच जाती है। नैतिक बुराइयों में निमग्न होने के बावजूद कथित धार्मिक लोग अपने बचाव और समाज में अपना स्तर और आदर-सम्मान बनाए रखने के लिए और साथ-साथ अपने को सही और सदाचारी साबित करने के लिए उपाय तलाशते हैं। अपने बचाव के लिए कथित मक्कार लोग अपनी धार्मिक पुस्तकों से छेड़छाड़ करते हैं और उनमें फेरबदल कर उस नैतिक बुराई को जो उनमें है, अपने देवताओं, अवतारों, ऋषियों, मुनियों और आदर्शों से जोड़ देते हैं और जनसाधारण को यह समझाकर अपने बचाव का रास्ता निकाल लेते हैं कि यह बुराई नहीं है बल्कि धर्मानुकूल है। ऐसा तो हमारे ऋषि-मुनियों और महापुरुषों ने भी किया है। नियोग के विषय में भी मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है। जब कौम में स्वच्छंद यौन संबंधों की अधिकता हो गई और जो बुराई थी, वह सामाजिक रस्म और रिवाज बन गई तो मक्कार लोगों ने उस बुराई को अच्छाई बनाकर अपने धार्मिक ग्रंथों में प्रक्षेपित कर दिया। प्राचीन काल में धार्मिक ग्रंथों में परिवर्तन करना आसान था, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों पर चन्द लोगों का अधिकार होता था। नियोग एक गर्हित और गंदी परंपरा है, इसे किसी भी काल के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।
भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति अत्यंत दयनीय प्रतीत होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषि, मुनियों और महापुरुषों द्वारा कुछ ऐसे नियम-कानून बनाए गए, जिन्होंने नारी को भोग की वस्तु और नाश्ते की प्लेट बना दिया। नियोग प्रथा ने विधवा स्त्री को कतई वेश्या ही बना दिया। जैसा कि आप ऊपर पढ़ चुके हैं कि एक विधवा 10 पुरुषों से नियोग कर सकती है। यहाँ विधवा और वेश्या ‘शब्दों को एक अर्थ में ले लिया जाए तो ‘शायद अनुचित न होगा। विधवाओं की दुर्दशा को चित्रित करने वाली एक फिल्म ‘वाटर’ सन् 2000 में विवादों के कारण प्रतिबंधित कर दी गई थी, जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर विधवाओं को वेश्याओं के रूप में दिखाया गया था। प्रायः विधवा स्त्रियाँ काशी, वृन्दावन आदि तीर्थस्थानों में आकर मंदिरों में भजन-कीर्तन करके और भीख मांगकर अपनी गुजर बसर करती थी, क्योंकि समाज में उनको अशुभ और अनिष्ट सूचक समझा जाता था।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी जी ने भी इस दशा का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘‘वृंदावन जब था तब था अब तो वेश्यावनवत्, लल्ला-लल्ली और गुरु-चेली आदि की लीला फैल रही है। (11-159), आज भी काशी में लगभग 16000 विधवाएं रहती हैं।
‘मनुस्मृति’ में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं। (3-21) इनमें आर्ष, आसुर और गान्धर्व विवाह को निकृष्ट बताया गया है मगर ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और मर्मज्ञों ने इनका भरपूर फायदा उठाया। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, मुनि पराशर, कौरवों-पांडवों के पूर्वज ‘ाान्तनु, पाण्डु पुत्र अर्जुन और भीम आदि ने उक्त प्रकार के विवाहों की आड़ में नारी के साथ क्या किया ? इसका वर्णन भारतीय ग्रंथों में मिलता है।
भारतीय ग्रंथों में नारी को किस रूप में दर्शाया गया है आइए अति संक्षेप में इस पर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं।
1. ‘‘ढिठाई, अति ढिठाई और कटुवचन कहना, ये स्त्री के रूप हैं। जो जानकार हैं वह इन्हें ‘ाुद्ध करता है।’’ (ऋग्वेद, 10-85-36)
2. ‘‘सर्वगुण सम्पन्न नारी अधम पुरुष से हीन है।’’
(तैत्तिरीय संहिता, 6-5-8-2)
3. नारी जन्म से अपवित्र, पापी और मूर्ख है।’’ (रामचरितमानस)
उक्त तथ्यों के आधार पर भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति और दशा का आकलन हम भली-भांति कर सकते हैं। भारतीय ग्रंथों में नारी की स्थिति दमन, दासता और भोग की वस्तु से अधिक दिखाई नहीं पड़ती। यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या आधुनिक भारतीय नारी चिंतकों की सोच अपने ग्रंथों से हटकर हो सकती है ? आइए भारतीय संस्कृति में नारी की दशा का आकलन करने के लिए छांदोग्य उपनिषद् के एक मुख्य प्रसंग पर भी दृष्टि डाल लेते हैं।
नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि, बह्वहं चरन्ती
परिचारिणी यौवने त्वामलमे साहमेतन्न वेद यद्
गोत्रत्वमसि, जाबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम
त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति।
(छांदोग्य उपनिषद् 4-4-2)
यह प्रसंग सत्यकाम का है। जिसकी माता का नाम जबाला था। सत्यकाम गौतम ऋषि के यहाँ विद्या सीखना चाहता था। जब वह घर से जाने लगा, तब उसने अपनी माँ से पूछा ‘‘माता मैं किस गोत्र का हूँ ?’’ उसकी माँ ने उससे कहा, ‘‘बेटा मैं नहीं जानती तू किस गोत्र का है। अपनी युवावस्था में, जब मैं अपने पिता के घर आए हुए बहुत से अतिथियों की सेवा में रहती थी, उस समय तू मेरे गर्भ में आया था। मैं नहीं जानती तेरा गोत्र क्या है ? मेरा नाम जबाला है, तू सत्यकाम है, अपने को सत्यकाम जबाला बताना।’’
क्या उपरोक्त उद्धरणों से तथ्यात्मक रूप से यह बात साबित नहीं होती कि भारतीय चिंतन में नारी को न केवल निम्न और भोग की वस्तु बल्कि नाश्ते की प्लेट समझा गया है ?
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