Thursday, November 18, 2010

धर्मः मानव जीवन की विडंबना

 ‍आधुनिक युग की वैज्ञानिक प्रगति स्तब्ध कर देने वाली है। इस प्रगति के पहिए की गति रोज़-ब-रोज़ तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है। कैसी अजीब विडंबना है कि मनुष्य के चारों ओर रोशनी ही रोशनी है मगर उसके अंतर में घोर अंधेरा है। मनुष्य के चारों ओर भीड़ ही भीड़ है मगर उसके अंतर में वीरानी और सुनापन है। बाहर सुख-सामग्री के अंबार है, सुविधाओं के ढेर हैं, मगर अंतर में दरिद्रता है, आख़िर क्यों ?
जीवन की यह दारुण त्रासदी है। आज मनुष्य पर धन-दौलत का भूत इस तरह सवार हो गया है कि उसकी समूची चिंतन प्रक्रिया प्रदूषित और नकारात्मक हो गई है। धन-दौलत की प्रबल चाहत में न केवल नैतिक मूल्य गौण हो गए हैं, बल्कि मानव जीवन में मूल्यों का शून्यक उपस्थित हो गया है। भौतिकता के इस दौर में न संबंधों का कोई महत्व रह गया है और न रिश्ते-नातों का। आज मनुष्य की नाप-तोल उसके पेशे और कमाई से की जा रही है। जिसके पास पैसा है, आज वही विद्वान है, वही सम्मानीय है, समाज में उसी का रूतबा है, चाहे वह लूटेरा व कातिल ही क्यों न हो।

अगर हम बाजार से एक माटी का दीया खरीदते हैं तो उसे हर रूख से देखकर खरीदते हैं। मगर जिन्‍दगी के मामले में इतने बेख़बर और लापरवाह है कि इसका कोई मूल्य नहीं समझते। हमारी ज़िंदगी का पल दर पल और कदम दर कदम हमें मौत की तरफ ले जा रहा है मगर हम इतनी बेफ़िक्री से जिन्‍दगी गुज़ार रहे हैं गोया कि हमें इस दुनिया से कभी जाना ही नहीं है।

अक्सर देखा जाता है कि आदमी की रात-दिन की भागदौड़ केवल पैसे और पेट के लिए है। लोगों की बातचीत का मौजू खाने-कमाने और मौजमस्ती के सिवाय कुछ और दिखाई नहीं पड़ता। जीवन के प्रति गंभीर चिंतन और सोच-विचार से अक्सर लोग खाली नज़र आते हैं। अधिकतर लोग ऐसे हैं जिनके ज़हन में इस विषय का सिरे से कोई तसव्वुर ही नहीं होता कि मानव जीवन का कोई उच्च लक्ष्य भी होता है या होना चाहिए। दुनियावीं मामलों में तो लोग काफ़ी समझदार और तेज़तर्रार देखे जाते हैं मगर जीवन के अभीष्ट (Aim) के विषय में उनके पास घिसी-पिटी और सड़ी-गली परंपरावादिता के सिवाय कुछ और नहीं होता।
अजीब विडंबना है कि लोग मालामाल तो होना चाहते हैं मगर काबिल और नेक बनना नहीं चाहते। दौलत कमाने के रास्ते में साधन की पवित्रता उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखती। आज के दौर में नेकी और ईमानदारी की बात करना ठीक ऐसा है जैसा कि हम लोगों की फ़ितरत के ख़िलाफ़ बात कर रहे हों। विचित्र विडंबना है कि आदमी को सुख और सुकून की तो तलाश है मगर ऐसी जगह ढूंढ रहा है जहाँ केवल बेकारी व बेकली के सिवाय कुछ नहीं। भला कुकृत्यों और लूट-खसोट की परिणति कभी सुखदायी कैसे हो सकती है ? भला बबूल का बीज बोकर आम और अंगूर की ख़्वाहिश कैसे पूरी हो सकती है ?

इसे भी मानव जीवन की विडंबना ही कहेंगे कि आदमी को दूसरों की बुराइयां और कमज़ोरियां तो खूब नज़र आती हैं, मगर अपनी बुराइयां और खामियां उसे नज़र नहीं आती। आदमी दूसरों का आकलन तो खूब करना जानता है, मगर फुर्सत में कभी अपना आकलन नहीं करता। अक्सर देखने में आता है कि आदमी जिस फीते से अपने आपको नापता है, दूसरों को नापने के लिए उस फीते का इस्तेमाल नहीं करता। यह भी देखने में आता है कि आदमी खुद अच्छी औलाद साबित नहीं होता, अपनी औलाद के सामने ही अपने बूढ़े माँ-बाप की नाकद्री करता है, मगर अपनी औलाद से यह उम्मीद करता है कि उसकी औलाद बुढ़ापे में उसके साथ अच्छा सुलूक करें। यह भी एक तथ्य है कि आदमी खुद भ्रष्ट होता है, मगर दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है। आदमी की कथनी और करनी में ज़मीन आसमान का अंतर देखने में आता है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहें ?
यह भी मानव जीवन की विडंबना ही है कि मनुष्य उस परम सत्ता के लिए तर्क और सबूत चाहता है जिसके अस्तित्व की निशानियां और प्रमाण कदम-कदम और ज़र्रे-ज़र्रे में मौजूद हैं और आदमी अपनी खुली आंखों से देख भी रहा है। भला बिना किसी नियंता के इस असीम और अद्भुत ब्रह्मांड का नियमन कैसे हो सकता है ? इस अति विशाल सृष्टि की नियमबद्धता और एक सूत्रता क्या इस तथ्य का खुला सबूत नहीं है कि कोई अदृश्य शक्ति इसका संचालन कर रही है ? कुछ लोग दुनियावीं ऐतबार से इतने काबिल हुए हैं कि उन्होंने अपने विचारों और कार्यों से दुनिया के एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया मगर उनकी अक्ल ने कभी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया। इन लोगों की लम्बी सूची में कार्ल माक्र्स (1818-1883), फ्रीडरिक नीत्शे (1844-1900), सिगमंड फ्रायड (1859-1939), बट्र्रंड रसल (1872-1956), अलबर्ट आइंसटीन (1879-1965), डा. भीमराव अंबेडकर (1891-1956), पंडित जवाहर लाल नेहरु (1889-1964), मानवेन्द्र नाथ राय (1886-1954) आदि कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने एक ऐसे सत्य का इंकार किया, जिसका इंकार इतनी बड़ी बेवकूफ़ी है जैसे कि कोई आदमी मृत्यु का इंकार करें और कहे कि उसे कभी मरना ही नहीं है। मृत्यु का सीधा सा मतलब ही यह है कि हमारा जीवन किसी अदृश्य सत्ता के अधीन है। आदमी मृत्यु का इंकार नहीं करता, मगर विडंबना है कि परम सत्ता का इंकार कर देता है। 

यहां उक्त विषयों के साथ यह बात भी ग़ौर करने के काबिल है कि अगर आदमी की ज़िंदगी का उद्देश्य कमाना-खाना और मौजमस्ती के सिवाय कुछ और नहीं है, तो फिर जंगली जानवरों की जिंदगी आदमी की ज़िंदगी से कहीं अधिक बेहतर है और अगर कमाने-खाने और मौजमस्ती के सिवाय भी आदमी की ज़िंदगी का कोई और उच्च उद्देश्य है तो फिर उसे छोड़कर या भूलकर आदमी की जिंदगी जंगली जानवरों की ज़िंदगी से कहीं अधिक बदतर है।

 कुछ लोग और समाज ऐसे हैं जो उस एक परम और चरम अदृश्य चेतन शक्ति को छोड़कर सूरज, चांद, तारे, मज़ार, नदी, वृक्ष, व्यक्ति, पशु आदि की पूजा-उपासना करते हैं। कैसी विचित्र विडंबना है कि लोग अपने हाथों से बनाई मूर्तियों को अपना इष्ट समझते हैं। पूजा-अर्चना के नाम पर मंदिरों में गाना-बजाना, नाचना होता है। हिंदू समाज में इतने देवी-देवता और पूजा पद्धतियाँ हैं कि शायद ही कोई समझ सके। असंख्य देवी देवताओं के बावजूद उपास्यों की संख्या रोज़-ब-रोज़ बढ़ती जा रही है। प्रतिवर्ष देवी-देवताओं के लुक और डिज़ाइन बदल जाते हैं। हमारे देवी देवता भी वक्त के साथ आधुनिक (Modern) और साइंटिफिक होते जा रहे हैं। एक ईश्वर की पूजा अर्चना करके मनुष्य संतुष्ट ही नहीं है। संतुष्ट हो भी तो कैसे, जब उसे यह पता ही नहीं है कि वह क्या और क्यों कर रहा है ?
प्रत्येक व्यक्ति और समाज जिसकी धारणा और आराधना विशुद्ध रूप से एक ईश्वर के लिए न हो, वह अज्ञानी और अज्ञान पूर्ण समाज है। यह एक विशुद्ध सत्य है, इसमें संदेह की कतई कोई गुंजाइश नहीं है। विडंबना यह है कि मनुष्य उस एक परम शक्ति को समझने और मानने के लिए तैयार नहीं है। बस आंखे बंद कर उसे ही सत्य मान लेता है जिसे वो परंपरा में देखता आ रहा है। सत्य को झुठलाकर और मूल से मुंह मोड़कर भला मनुष्य कैसे संतुष्ट हो सकता है ? भला अपने हाथों बनाई भिन्न प्रकार की मूर्तियों के आगे गाना, बजाना, नाचना और फूल, फल, पत्ते आदि चढ़ाना धर्म और आराधना का हिस्सा कैसे हो सकता है ? यह सब ढोंग है। आख़िर यह बात हमारी समझ में क्यों नहीं आती ?

हिंदू समुदाय में विभिन्न प्रकार के व्रत-उपवासों का प्रचलन है। उपवास का अर्थ तो यह है कि जिस दिन का उपवास हो, उस दिन कुछ भी न खाया-पिया जाए, पानी भी नहीं। दिन की अवधि भोर होने से सूर्य अस्त होने तक है। मगर यह विडंबना है कि विभिन्न प्रकार के हिंदू धर्म अनुयायी उपवास की अवधि में कुछ पदार्थों को छोड़कर सब कुछ खाते-पीते हैं। उपवास के दिन पानी, चाय, दूध तो क्या, कोट्टू और सिंघाड़े के आटे के पराठे-पकौड़ी, आलू के बने आइटम, टिकिया, हलुवा, चिप्स आदि, पौसाई के चावल और साबूदाने की खीर आदि, फलाहार केला, सेब, संतरा, अनार, अमरूद, पपीता आदि, सलाद, खीरा, ककड़ी आदि, चैलाई के लड्डू, मिठाइयां आदि, काजू, मखाने, मूंगफली, अखरोट आदि सब कुछ खाया-पिया जाता है। उक्त आइटमों के साथ बीड़ी-सिगरेट, पान आदि की भी कोई मनाही नहीं है। ये सब आइटम सूर्य उदय होने के बाद और अस्त होने से पहले उसी अवधि में खाये-पिये जाते हैं, जिस अवधि का उपवास होता है। बस गेहूँ, चना, चावल, हल्दी और साधारण नमक आदि नहीं खाया जाता। साधारण नमक की जगह सेंधा नमक इस्तेमाल किया जाता है। अब ज़रा सोचिए! अगर उपवास के दिन सब कुछ खाया-पिया जा सकता है तो फिर उपवास कैसा? आख़िर उक्त विधि-निषेधों का मूल स्रोत क्या है ? कहा जाता है कि उपवास के दिन अन्न नहीं खाया जाता और अन्न केवल गेहूं, चना, चावल, दाल, मक्का, हल्दी आदि भोज्य पदार्थ हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि अन्न प्रत्येक भोज्य पदार्थ को कहते हैं। आख़िर इतनी सी बात हमारी समझ में क्यों नही आती कि उपवास का मतलब कुछ भी न खाने से है ? मगर हम चंद चीजों को छोड़कर सब कुछ खाते-पीते हैं। आख़िर ऐसे उपवास की हमारे जीवन में महत्व और उपयोगिता क्या है ? आख़िर हम सोचते क्यों नहीं ? कहीं अंधविश्वासों से हमारी चिंतन शक्ति जवाब तो नहीं दे गई है ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम एक समुदाय विशेष के विरोध और द्वेष में ऐसा कर रहे हों कि वे अपने उपवास में कुछ नहीं खाते, हम सब कुछ खाएंगे। क्या धर्म के नाम पर हम अपनी मर्जी से कुछ भी करें हमारे लिए वही सत्य है ? क्या हमारी आस्थाओं और धारणाओं का कोई आधार नहीं है, जो हमारा मार्गदर्शन करें ?
हिंदू समाज में अनेक ऐसे रीति रिवाज और कर्मकांड प्रचलित हैं जो न तो धर्म का हिस्सा है और न ही सामाजिक दृष्टि से उनकी कोई उपयोगिता है। वे रीति-रिवाज केवल आडंबर और ढोंग हैं, मगर लोगों ने उन कर्मकांडों को धार्मिक रीति-रिवाज से जोड़ दिया है। धार्मिक त्योहारों के नाम पर ऐसी-ऐसी परंपराओं का निर्वाह किया जा रहा है कि जो न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि मानवता को शर्मसार करने वाली है। विडंबना यह है कि उन परंपराओं को निभाने में पूरा समाज पूरी निष्ठा और धार्मिकता के साथ संलिप्त और निमग्न है। वास्तविक धार्मिक प्रतिमानों और संदेशों से अनभिज्ञ लोग धर्म के नाम पर संस्कारहीन और अनैतिक आचरण करते हैं। धार्मिक त्योहारों में पूजा-अर्चना के नाम पर अनैतिक और अमर्यादित मौजमस्ती, नाचना, गाना-बजाना होता है। धर्म और अध्यात्म के नाम पर होली का हुड़दंग, अश्लीलता और मोज़मस्ती होती है। होली के दिन जहां शराब पी जाती है, वहीं दीपावली के दिन जुआ खेला जाता है। एक तरफ यज्ञ को पूजा और पर्यावरण शुद्धि का अनुष्ठान समझा जाता है, वहीं दीपावली के दिन वायु को विषाक्त और प्रदूषित करने को धर्म का हिस्सा समझा जाता है। आंकड़े बताते हैं कि लगभग 2500 से 3000 करोड़ रुपये का गंधक और पोटाश प्रतिवर्ष दीपावली के दिन वातावरण में घोल दिया जाता है। 

कैसी विडंबना है कि जहाँ जैन समाज के लोग तीर्थंकर महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस को प्रतिवर्ष दीपावली के रूप में मनाते हैं, वहीं आर्यसमाजी स्वामी दयानंद सरस्वती के मृत्यु दिवस को उत्साह और खुशी के साथ मनाते हैं। विदित रहे कि दोनों महापुरुषों की मृत्यु दीपावली के दिन हुई थी। समाज में एक बात यह भी देखने में आ रही है कि शादी समारोह हो या बूढ़े व्यक्ति का मृतक भोज, दोनों में कोई अंतर देखने में नहीं आता। विचारणीय अवसरों पर भी लोगों की बातचीत का मौजू खाना-कमाना ही होता है।
एक नज़र भारतीय साधु समाज को देखिए, जो परिवार और समाज के दायित्व से बहुत दूर निठल्ली और ऐश परस्त ज़िंदगी जी रहा है। उनके अंदर अंधविश्वास, ढोंग और छल कपट कूट-कूट कर भरा होता है। भिन्न प्रकार के साधु जिनकी तादाद लगभग 70 लाख बताई जाती है, उन साधु महात्माओं में अधिकतर लोग अपराधी और अपराध प्रवृत्ति के होते हैं। उनके कृत्यों को देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। उनके अंदर धर्म और नैतिकता का कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ता। नंगे और गंदे रहने को वे तप और तपस्या समझते हैं। शराब, सुलफा, भांग, गांजा पीने-खाने को वे धर्म और पुण्य का काम समझते हैं। यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि हिंदू-मंदिरों में स्त्रियों के सामने साधुओं का सुलफा, शराब पीकर नग्न तांडव करना और उत्पात मचाना साधारण सी बात है। मंदिरों की दशा दयनीय ही नहीं बल्कि चिंताजनक है। ग्रामीण क्षेत्रों में मंदिर सामूहिक नशा केन्द्र तो हैं ही, वहाँ महात्माओं द्वारा सट्टेबाजों को सट्टे भी बताए जाते हैं। हिंदू मंदिरों में धर्म और पूजा की आड़ में बड़े-बड़े लज्जाजनक और घिनौने कृत्य होते हैं। साधु लोग अपनी ढोंग और ठग विद्या से गांव की भोली भाली महिलाओं को अपने मोह जाल में फांस लेते हैं। 

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के निर्माता आचार्य स्वामी दयानंद सरस्वती नंगे रहा करते थे। कैसी अजीब विडंबना है कि हिंदू समाज में नग्नता और अश्लीलता को धर्म और अध्यात्म का हिस्सा समझा जाता है। अजंता, एलोरा, कोणार्क, खजुराहों आदि मंदिरों में कामबंध प्रतिमाओं को हिंदू संस्कृति की धरोहर माना जाता है। इन मंदिरों के विषय में कवि रामधारी सिंह दिनकर (1908-1974) ने अपनी मुख्य पुस्तक ‘‘संस्कृति के चार अध्याय’’ में लिखा है, ‘‘कैसा रहा होगा वह समय और समाज, जिसके विश्वास की पताका, कोणार्क, पुरी, भुवनेश्वर और खजुराहों के मंडपों पर फहरा रही है ? मंडप के भीतर शिव और शक्ति की प्रतिमाएं और मंडप के ऊपर नर-नारी समागम की नग्न मूर्तियां और काम के कर्म-चित्र, जिनकी ओर भाई-बहन एक साथ आंखे उठाकर नहीं देख सकते। इन मूर्तियों को देखकर आज का जनमानस शर्माता है। क्या उन दिनों कोई जनमत नहीं था ? आज का जनमत जनता बनाती है, उस समय का जनमत साधु-संन्यासी, राजा और राजदरबारी तैयार करते थे।’’
आज हिंदू समाज में धार्मिक उपदेशों और प्रवचनकर्ताओं की बाढ़ सी आई हुई है। धार्मिक उपदेशों और प्रवचनों के नाम पर पेशेवर कथावाचक और उपदेशक किस्से-किवंदंतियों लोगों को सुनाते-समझाते हैं जिन्हें सुनकर श्रोतागण या तो भावुक हो रोने लगते हैं या फिर मन-मुग्ध हो नाचने-गाने लगते हैं। कथित उपदेशक जीवन जीने के ऐसे आसान रास्ते लोगों को बतलाते हैं जिससे न तो उनके जीवन की रोजमर्रा की लूट खसोट में रत्ती भर अंतर पड़ता है और न ही आचार-विचार में सुधार आता है। यहां सत्कर्म और आत्मशुद्धि को नहीं कर्मकांड को महत्व दिया जाता है जैसे गंगा में नहाने से सैकड़ों जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं, गाय की सेवा करने से मनुष्य करोड़ों-करोड़ों जन्मों के पापों से तर हो जाता है, गुरु सेवा और भक्ति से मनुष्य को परमेश्वर के दर्शन हो जाते हैं। वास्तविकता से कतई अनभिज्ञ भोली-भाली जनता तथाकथित परमपूज्यों के श्रीमुख से निकले शब्दों को ही अंतिम सत्य मान लेती है, क्योंकि परम पूज्यों से तर्क-वितर्क और संवाद करना पाप और अपराध समझा जाता है। धर्म के मामले में हम इतने अंधविश्वासी व रूढ़िवादी हैं कि धर्म से संबंधित किसी विषय के साथ क्या व क्यों जुड़ते ही हम भौचक्के से खड़े रह जाते हैं। जब हम विज्ञान और कानून आदि में तर्क-वितर्क कर सकते हैं तो धर्म में क्यों नहीं कर सकते?

हिंदू धार्मिक प्रतिमानों में ऊहापोह की विचित्र स्थिति देखने में आती है। महात्मा गौतम बुद्ध ने कहा ‘‘वेद-वेदान्त में सत्य का लवलेश तक नहीं है।’’ फिर भी बुद्ध देव को सबसे बड़ा वेदान्ती और हिंदुत्व का शोधक कहा गया। डॉ. अंबेडकर का चिंतन और दर्शन हिंदुत्व विरोधी रहा है। उन्होंने न केवल हिंदू धर्म की घोर निंदा और कटु आलोचना की है बल्कि उन्होंने मुनस्मृति में सार्वजनिक रूप से आग भी लगाई थी। डॉ. अंबेडकर (1891-1956) ने कहा था, ‘‘मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ हूँ, यह मेरे अधिकार में नहीं था, मगर मैं इस धर्म में मरूंगा नहीं।’’ इन परिस्थितियों में डॉ. अंबेडकर ने पाँच लाख व्यक्तियों के साथ 14 अक्टूबर सन् 1956 को बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। इसके बावजूद भी आज के हिंदू विद्वान और चिंतक डॉ. अंबेडकर को हिंदुत्व का प्रखर चिंतक, हितैषी और समर्थक कह रहे हैं। क्या यह विडंबना नहीं है ?
हिंदू धर्म में ईश्वरवाद और अनीश्वरवाद दोनों का, सर्वेश्वरवाद और बहुदेववाद दोनों का, आवागमन और परलोकवाद दोनों का, शाकाहार और मांसाहार दोनों का ऐसा अद्भुत समावेश किया गया है कि मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि यह एक प्राचीन सभ्यता का असीम औदार्य है या शेखचिल्लीपन। वेदों और उपनिषदों की आवाज एक नहीं है। रामायण और गीता एक दूसरे से भिन्न हैं। उत्तर का हिंदुत्व दक्षिण से भिन्न है। स्वामी दयानंद का हिंदुत्व स्वामी विवेकानन्द से भिन्न है। 19वीं सदी में जहां आर्य समाज के संस्थापक ने हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करते हुए मूर्ति पूजा, व्रत, उपवास, अवतारवाद, तीर्थयात्रा आदि को पाखंड और मूर्खतापूर्ण बताया वहीं रामकृष्ण परमहंस (1836-1886) और रामकृष्ण मिशन के संस्थापक कर्मठ वेदांती स्वामी विवेकानंद (1863-1902) ने समग्र हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करते हुए मूर्ति पूजा, व्रत, उपवास, अवतारवाद, तीर्थयात्रा आदि सभी को सार्थक और अनिवार्य बताया है। हिंदू धर्म की इतनी स्थापनाएं और उपस्थापनाएं हैं कि समझना और समझाना तथा इसकी कोई खूबी बयान करना अत्यंत मुश्किल काम है। 

कठोपनिषद् की उक्ति है, ‘‘न वित्तेनतर्पणीयों मनुष्यः।’’ मनुष्य धन दौलत से कभी तृप्त नहीं हो सकता। एक हदीस है, ‘‘अगर मनुष्य को सोने की एक घाटी दे दी जाए तो वह दूसरी की तमन्ना करेगा।’’ मगर मनुष्य सुख और सुकून के लिए धन-दौलत के पीछे आंख मूंदकर भाग रहा है। आज दौलत आदमी की सबसे बड़ी खूबी हो गई है। सद्गुण, सदभाव और सदाचार सब गुज़रे ज़माने की वस्तु बन गई है। आज मनुष्य जीवन की तुच्छताओं के गोरखधंधे में ऐसा उलझकर रह गया है कि उसे जीवन की वास्तविकता के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं है। जीवन की यह दारूण त्रासदी है कि जीवन के मूलभूत अभिप्राय को विस्मृत और उपेक्षित करके मनुष्य शारीरिक सुखभोग में लीन हो गया है, जबकि मानव जीवन में महत्वपूर्ण चीज़ अभीष्ट (Aim) है, शारीरिक सुखभोग नहीं। मौत की एक सख्ती मनुष्य जीवन की तमाम खुशियों और ऐशोआराम को खाक़ में मिला देती है। अतः सच यही है कि हम दुनिया की मूर्खतापूर्ण विलासिताओं में सिर के बल कूद-कूद कर कितने भी गोते लगा लें, अगर हमने जीवन के अभीष्ट (Aim) को तलाश नहीं किया तो हमारे जीवन का महत्व कीड़े-मकोड़ों से अधिक नहीं है। ईश्वरीय सत्ता की अवहेलना और जीवन के असल उद्देश्य की उपेक्षा हमें आर्थिक और वैज्ञानिक उन्नति के शिखर पर तो ले जा सकती है, मगर मनुष्य जीवन का अभीष्ट (Aim) प्राप्त नहीं करा सकती।
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